Wednesday, December 29, 2010

"बस इतना अधिकार मुझे दो"

"बस इतना अधिकार मुझे दो"
तुमसे माँगू ? कैसे माँगू
याचक कब अधिकारी होता
माँग सके जो अपना इच्छित
मीत ! प्रीत सम्पूर्ण समर्पण
की ही  परिभाषा होती है
अगर अपेक्षायें जुड़ जाये
प्रीत अर्थ अपना खोती है
और प्रीत में खोना पाना
देना लेना अर्थहीन सब
प्राप्ति और उपलब्धि प्रीत से
प्रियतम बँधी कहाँ बोलो कब ?


इच्छित ही जब शेष न रहता
खर्च करूँ क्यों शब्दों को फिर
अधिकारों की माँग करे जो
होता अधिकारों से वंचित

युग ने कितनी बार कहा है
माँगे भीख नहीं मिलती है
झोली फ़ैली हुई सदा ही
भरने में अक्षम रहती है
जहाँ पात्रता है सीपी सी
मोती वहीं सुलभ होते हैं
मरुथल के हिरना बून्दों की
तृष्णा लिये हुए सोते हैं

"बस इतना अधिकार मुझे दो"
नही नहीं ये कह न सकूंगा
है संतुष्टि उसी से मेरी
जो आंजुरि में होता संचित.

Tuesday, May 18, 2010

राकेश खण्डेलवाल जी को जन्मदिवस की हार्दिक मंगलकामनायें।
तुम सलामत रहो हज़ार बरस …………………………। 

Tuesday, March 23, 2010

रास्ता ही

रास्ता ही

रास्ता ही भूल जाओ एक दिन

आओ मेरे घर भी आओ एक दिन

 

बासी रोटी से ज़रा आगे बढ़ो

उसको टॉफ़ी भी खिलाओ एक दिन

 

क्या मिलेगा ऐसे गुमसुम बैठ कर,

साथ मेरे गुनगुनाओ एक दिन

 

बर्फ़ सम्बन्धों की पिघलेगी ज़रूर

धूप जैसे मुस्कराओ एक दिन

 

घर के सन्नाटे में गुम हो जाओगे

दौड़ती सड़कों पे आओ एक दिन

                          

Tuesday, March 9, 2010

शब्द हैं अजनबी

शब्द हैं अजनबी


शब्द आते नहीं होंठ पर अब मेरे,

भावना सो गई शाल इक ओढ़ कर

कंठ में स्वर अटकते हुए रह गये,

आये बाहर नहीं मौन को तोड़ कर

कुछ कहा न गया, कुछ लिखा न गया,

वाणी चुप हो रही, शब्द हो अजनबी

और वह इक कलम जिसको अपना कहा,

वो भी चल दी मेरे हाथ को छोड़ कर

Tuesday, October 20, 2009

माना मद्धम है

माना  मद्धम  है, थरथराती  है
फिर भी इक लौ तो जगमगाती है

 मैं अकेला कभी नहीं गाता
वो मेरे साथ गुनगुनाती है

हां ये सच है के कुछ दरख़्त कटे
एक बुलबुल तो फिर भी गाती है

मैं अकेला कहां मेरे मन में 
एक तस्वीर मुस्कराती है

आँख कितनी ही मूंद ले कोई
ज़िन्दगी आइना दिखाती है

Thursday, August 13, 2009

सबको मालूम थे

सबको मालूम थे हमसे भी भुलाए न गए
वे कथानक जो कभी तुमको सुनाये न गए 

गीत लिखते रहे जीवन में अंधेरों के खिलाफ़
और दो-चार दिये तुमसे जलाए न गए
 
दूर से ही सुनीं वेदों की ऋचाएं अक्सर
यज्ञ में तो कभी शम्बूक बुलाए न गए 

यूकेलिप्टस के दरख्तों में न छाया न नमी
बरगद-ओ-नीम कभी तुमसे लगाए न गए

इसी बस्ती में सुदामा भी किशन भी हैं नदीम
ये अलग बात है मिलने कभी आये न गए

Saturday, August 1, 2009

डा० अमर ज्योति--जन्म दिन शुभ हो

पीर के अश्रुओं से भरी लेखनी, शब्द को जन्म दे, खिलखिलाती रहे
राह की धूल यमुना की रेती बनी, आपके भाल टीका लगाती रहे
चार दिन छह दहाई शती त्रय दिवस,आज का ही निरंतर करें अनुसरण
भोर आ नज़्म की वीथिका में किरण, से गज़ल का कलेवर सजाती रहे

सादर शुभकामनाओं सहित


राकेश