"बस इतना अधिकार मुझे दो"
तुमसे माँगू ? कैसे माँगू
याचक कब अधिकारी होता
माँग सके जो अपना इच्छित
मीत ! प्रीत सम्पूर्ण समर्पण
की ही परिभाषा होती है
अगर अपेक्षायें जुड़ जाये
प्रीत अर्थ अपना खोती है
और प्रीत में खोना पाना
देना लेना अर्थहीन सब
प्राप्ति और उपलब्धि प्रीत से
प्रियतम बँधी कहाँ बोलो कब ?
इच्छित ही जब शेष न रहता
खर्च करूँ क्यों शब्दों को फिर
अधिकारों की माँग करे जो
होता अधिकारों से वंचित
युग ने कितनी बार कहा है
माँगे भीख नहीं मिलती है
झोली फ़ैली हुई सदा ही
भरने में अक्षम रहती है
जहाँ पात्रता है सीपी सी
मोती वहीं सुलभ होते हैं
मरुथल के हिरना बून्दों की
तृष्णा लिये हुए सोते हैं
"बस इतना अधिकार मुझे दो"
नही नहीं ये कह न सकूंगा
है संतुष्टि उसी से मेरी
जो आंजुरि में होता संचित.
Wednesday, December 29, 2010
Tuesday, May 18, 2010
Tuesday, March 23, 2010
रास्ता ही
रास्ता ही
रास्ता ही भूल जाओ एक दिन
आओ मेरे घर भी आओ एक दिन
बासी रोटी से ज़रा आगे बढ़ो
उसको टॉफ़ी भी खिलाओ एक दिन
क्या मिलेगा ऐसे गुमसुम बैठ कर,
साथ मेरे गुनगुनाओ एक दिन
बर्फ़ सम्बन्धों की पिघलेगी ज़रूर
धूप जैसे मुस्कराओ एक दिन
घर के सन्नाटे में गुम हो जाओगे
दौड़ती सड़कों पे आओ एक दिन
Tuesday, March 9, 2010
शब्द हैं अजनबी
शब्द हैं अजनबी
शब्द आते नहीं होंठ पर अब मेरे,
भावना सो गई शाल इक ओढ़ कर
कंठ में स्वर अटकते हुए रह गये,
आये बाहर नहीं मौन को तोड़ कर
कुछ कहा न गया, कुछ लिखा न गया,
वाणी चुप हो रही, शब्द हो अजनबी
और वह इक कलम जिसको अपना कहा,
वो भी चल दी मेरे हाथ को छोड़ कर
शब्द आते नहीं होंठ पर अब मेरे,
भावना सो गई शाल इक ओढ़ कर
कंठ में स्वर अटकते हुए रह गये,
आये बाहर नहीं मौन को तोड़ कर
कुछ कहा न गया, कुछ लिखा न गया,
वाणी चुप हो रही, शब्द हो अजनबी
और वह इक कलम जिसको अपना कहा,
वो भी चल दी मेरे हाथ को छोड़ कर
Tuesday, October 20, 2009
माना मद्धम है
माना मद्धम है, थरथराती है
फिर भी इक लौ तो जगमगाती है
मैं अकेला कभी नहीं गाता
वो मेरे साथ गुनगुनाती है
हां ये सच है के कुछ दरख़्त कटे
एक बुलबुल तो फिर भी गाती है
मैं अकेला कहां मेरे मन में
एक तस्वीर मुस्कराती है
आँख कितनी ही मूंद ले कोई
ज़िन्दगी आइना दिखाती है
Thursday, August 13, 2009
सबको मालूम थे
सबको मालूम थे हमसे भी भुलाए न गएवे कथानक जो कभी तुमको सुनाये न गए
गीत लिखते रहे जीवन में अंधेरों के खिलाफ़और दो-चार दिये तुमसे जलाए न गए दूर से ही सुनीं वेदों की ऋचाएं अक्सरयज्ञ में तो कभी शम्बूक बुलाए न गए
यूकेलिप्टस के दरख्तों में न छाया न नमीबरगद-ओ-नीम कभी तुमसे लगाए न गए
इसी बस्ती में सुदामा भी किशन भी हैं नदीमये अलग बात है मिलने कभी आये न गए
Saturday, August 1, 2009
डा० अमर ज्योति--जन्म दिन शुभ हो
पीर के अश्रुओं से भरी लेखनी, शब्द को जन्म दे, खिलखिलाती रहे
राह की धूल यमुना की रेती बनी, आपके भाल टीका लगाती रहे
चार दिन छह दहाई शती त्रय दिवस,आज का ही निरंतर करें अनुसरण
भोर आ नज़्म की वीथिका में किरण, से गज़ल का कलेवर सजाती रहे
सादर शुभकामनाओं सहित
राकेश
राह की धूल यमुना की रेती बनी, आपके भाल टीका लगाती रहे
चार दिन छह दहाई शती त्रय दिवस,आज का ही निरंतर करें अनुसरण
भोर आ नज़्म की वीथिका में किरण, से गज़ल का कलेवर सजाती रहे
सादर शुभकामनाओं सहित
राकेश
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