Tuesday, July 29, 2008

खतरे में इस्लाम नहीं !

शहरोज़ के ब्लाग ( Hamzabaan हमज़बान )पर हबीब जालिब द्वारा लिखित ख़तरे में इस्लाम नहीं यह नज़्म मेरी पसंद की सबसे खुबसूरत रचनाओं में से एक, यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ! आज जो लोग यह नारा बुलंद करते हैं की इस्लाम खतरे में है, उनको इसमें बड़ी मजबूती के साथ जवाब दिया है !

ख़तरे में इस्लाम नहीं

खतरा है ज़र्दारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी ज़मीं को घेरे हुए
हैंआख़िर चंद घराने क्यों
नाम नबी का लेनेवाले
उल्फत से बेगाने क्यों

खतरा है खूंख्वारों को
रंग-बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

आज हमारे नारों से
लर्जां है बपा एवानों में
बिक न सकेगें हसरतो-अरमाँ
ऊँची सजी दुकानों में

खतरा है बटमारों को
मगरिब के बाज़ारों को
चोरों को,मक्कारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

अमन का परचम लेकर उट्ठो
हर इंसान से प्यार करो
अपना तो मन्शूर है जालिब
सारे जहाँ से प्यार करो

खतरा है दरबारों को
शाहों के गम्ख्वारों को
नव्वाबों,गद्दारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
( आभार सहित Hamzabaan से )

(शबाब=जवानी, ईदे-कुर्बां=कुर्बानी का दिन , सवाब=पुन्य ,ज़र्दारों=पूंजीपतियों,नबी=पैगम्बर मोहम्मद,एवानों=संसद,मगरिब=पश्चिम,मन्शूर=घोषणा-पत्रगम्ख्वारों=हमदर्दों)

6 comments:

advocate rashmi saurana said...

bhut bhut aabhar itani sundar rachana ko padhane ke liye. jari rhe.

राज भाटिय़ा said...

खतरा है दरबारों को
शाहों के गम्ख्वारों को
नव्वाबों,गद्दारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
सच मे कहा गया हे, इस्लाम कया किसी भी धर्म को कोई खतरा नही, अगर खतरा हे तो गद्दी को, पार्टी को,सतीश जी धन्यवाद एक शान दार कविता पॆश करने के लिये,

Udan Tashtari said...

वाह! पढ़वाने का आप को बहुत शुक्रिया.

vipinkizindagi said...

सतीश जी धन्यवाद....
बेहतरीन कविता पढ़वाने के लिये.....

शहरोज़ said...

सतीश जी सह्रदयी व्यक्ति हैं ही साहित्य-कला के पारखी भी हैं.
जब हमज़बान पर वो आये , यकीनन जल्दीबाजी में रहे होंगे.अन्यथा उनसे ऐसी भूल हरगिज़ न होती.
लेकिन अमर-रचना शायद इसे ही कहते हैं.कविता के बोल आप गुनगुनाते रहें और कवि का नाम कहीं स्मरण में न हो.
खैर, मैं तमाम पाठकों से अपनी और से क्षमा चाहता हूँ .ये कविता उर्दू के क्रांतिकारी शायर हबीब जालिब की है.इनके परिचय के लिए आप www.hamzabaan.blogspot.com/ पर आने की ज़हमत करें.

सतीश जी का आभार.कविता की पेशकश के लिए.

महामंत्री-तस्लीम said...

बहुत बेबाक नज्म है।
पढवाने का शुक्रिया।