Thursday, August 28, 2008

श्रद्धा जी की कलम से निकली एक भीगी ग़ज़ल !

साधारण गीत , गज़लों से अलग इस ग़ज़ल में कुछ ऐसे भावः तथा दर्द है, जो श्रद्धा जी के प्रति अनायास ही एक श्रद्धा जगा देता है ! आपके सामने पेश है उनकी एक ग़ज़ल ....
( साभार साझा सरोकार से "आज़ादी पर श्रद्धा की बानगी" )


मौसम बदला, रुत बदली है, ऐसे नही दिलशाद हुए
हिंदू - मुस्लिम एक हुए जब, तब जाकर आज़ाद हुए
कितने अल्हड़ सपने थे जो दॉर–ए- सहर में टूट गये
कितने हँसमुख चेहरे रोए, कितने घर बर्बाद हुए
नहीं थी कोई जाति पाती, न ही दिलों में बँटवारा
हिंदू मुस्लिम, सिख, ईसाई, धरम अभी ईजाद हुए
कुर्बानी शामिल उनकी भी, क्यूँ आज पराए कहलाए
कालिख इक चेहरे की "क़ौम" पे, हम इतने जल्लाद हुए
हाथ बढ़ाओ , गले लगाओ, भेद भाव अब जाने दो
नमन हमारा हो उनको, जो भारत की बुनियाद हुए

- श्रद्धा जैन
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Sunday, August 17, 2008

अमरज्योति की एक कविता लेखकों के प्रति !

अमर की लिखी निम्न कविता " राजा लिख " मेरी सर्वाधिक पसंद की गयी कविताओं में से एक है ! यह कविता आधुनिक गीतकार, कवियों तथा लेखक मठाधीशों पर एक तीखा व्यंग्य है ! हम आजकल क्या लिखें ...क्या लिख रहे हैं ॥जो कुछ भी लिखते हैं अपना फायदा देख कर लिखते हैं ! लेख़क समाज पर किए गए तीखे व्यंग्य के लिए आभार सहित यह कविता यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ !

राजा लिख और रानी लिख।
फिर से वही कहानी लिख॥
बैठ किनांरे लहरें गिन।
दरिया को तूफ़ानी लिख॥

गोलीबारी में रस घोल।
रिमझिम बरसा पानी लिख॥
राम-राज के गीत सुना।
हिटलर की क़ुरबानी लिख॥

राजा को नंगा मत बोल।
परजा ही बौरानी लिख॥
फ़िरदौसी के रस्ते चल।
मत कबीर की बानी लिख॥

random rumblings से साभार !