Thursday, August 28, 2008

श्रद्धा जी की कलम से निकली एक भीगी ग़ज़ल !

साधारण गीत , गज़लों से अलग इस ग़ज़ल में कुछ ऐसे भावः तथा दर्द है, जो श्रद्धा जी के प्रति अनायास ही एक श्रद्धा जगा देता है ! आपके सामने पेश है उनकी एक ग़ज़ल ....
( साभार साझा सरोकार से "आज़ादी पर श्रद्धा की बानगी" )


मौसम बदला, रुत बदली है, ऐसे नही दिलशाद हुए
हिंदू - मुस्लिम एक हुए जब, तब जाकर आज़ाद हुए
कितने अल्हड़ सपने थे जो दॉर–ए- सहर में टूट गये
कितने हँसमुख चेहरे रोए, कितने घर बर्बाद हुए
नहीं थी कोई जाति पाती, न ही दिलों में बँटवारा
हिंदू मुस्लिम, सिख, ईसाई, धरम अभी ईजाद हुए
कुर्बानी शामिल उनकी भी, क्यूँ आज पराए कहलाए
कालिख इक चेहरे की "क़ौम" पे, हम इतने जल्लाद हुए
हाथ बढ़ाओ , गले लगाओ, भेद भाव अब जाने दो
नमन हमारा हो उनको, जो भारत की बुनियाद हुए

- श्रद्धा जैन
-http://bheegigazal.blogspot.com/
-http://saajha-sarokaar.blogspot.com/

14 comments:

Anil Pusadkar said...

satish ji aabhar aapka achhi rachana padhwane ka aur shradha ji ko badhai hamesha ki tarah achhi post ki

Udan Tashtari said...

श्रद्धा जी को पढ़वाने का आप को बहुत शुक्रिया.

बेहतरीन !!

राज भाटिय़ा said...

सतीश जी आप का ओर श्रद्धा जी का आभार इतनी अच्छी कविता के लिये.
धन्यवाद

नीरज गोस्वामी said...

मौसम बदला, रुत बदली है, ऐसे नही दिलशाद हुए
हिंदू - मुस्लिम एक हुए जब, तब जाकर आज़ाद हुए
बहुत सही बात...
नीरज

अनुराग said...

shukriya ise padhvaane ka.....

Dr. Chandra Kumar Jain said...

हमारा भी नमन
भारत की बुनियाद को.
==================
अच्छी प्रस्तुति
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

शहरोज़ said...

sateesh ji rachnaon k aadaan-prdaan se rachnakaar aur rachna donon ka bhala ho jaata hai.aur logon ko padhne ka sukh bhi mil jaata hai.
aap sarthak kaam kar rahe hain.

श्रद्धा जैन said...

bhaut bahut dhanyvaad
satish ji ki aapne meri is gazal ko apne blog par sathaan diya
ye mere liye bhaut subhagya ki baat hai

Anil ji aapka saath mere shabdon ko hamesha milta raha hai main dil se aapki abhari hoon

sameer ji aap kato shukriya ada nahi karungi ab apno ka shukriya koun ada karega

raj ji bhaut bhaut shukriya aapka

Neeraj ji jab bhi aapko apni gazal par dekhti hoon gazal azeez ho jaati hai

Dr anurag ke bina to meri koi gazal puri nahi hoti
aapke bina to main iski kalapna bhi nahi kar sakti


Chandra kumar ji aapka behad shukriya ki aapne padha aur saraha

aur sharoz ji
aapne jo saath diya aur rasta dikhaya uska shukriya nahi karungi use ek chhote se shabad shukriya se nahi chukaya jaa sakta

दिनेशराय द्विवेदी said...

धन्यवाद सतीश जी, आप ने बहुत ही सुंदर और सामयिक ग़ज़ल को स्थान दिया।
श्रद्धा जी ने जिस तरह बात को इस ग़ज़ल में पेश किया है वह काबिले तारीफ से कुछ अधिक ही है।

हरि said...

आपकी और श्रद्धा जी की भावनाओं को नमन

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

श्रद्धा जी को बधाई। यह शेर तो मन को छू गया-
कितने अल्हड़ सपने थे जो दॉर–ए- सहर में टूट गये
कितने हँसमुख चेहरे रोए, कितने घर बर्बाद हुए।

भवेश झा said...

मौसम बदला, रुत बदली है, ऐसे नही दिलशाद हुए
हिंदू - मुस्लिम एक हुए जब, तब जाकर आज़ाद हुए

aaj ke es political khel me sayad ye fit nai baithta, ye bat mai es liye nai kah raha ki mai ek rss ka member hu, mai rss ka member hun apne soch ko lekar ye gajal mujhe bilkul aaj ke daur ke liye sahi nai laga, sry

sachin said...

very nice blog...

http://shayrionline.blogspot.com/

राष्ट्रप्रेमी said...

सतीश जी आप से शिकायत है इस ब्लोग के बारे में इतनी देर से क्यों बताया? श्रद्धा जी का आभार इतनी अच्छी कविता के लिये! मानवता ही सबसे अच्छा धर्म है हम इन्सान को धर्म,लिन्ग व जाति में बांटना छोडकर देश व समाज पर रहम करें.
धन्यवाद