Tuesday, September 30, 2008

दवा-ए-दर्द-ए-दिल

दवा-ए-दर्द-ए-दिल के नाम पर अब ये भी कर जायें;
किसी के दुख में शामिल हों,किसी मुफ़लिस के घर जायें।

ये शेख़-ओ-बिरहमन का दौर है; इसमें यही होगा
कि मस्जिद और शिवालों की वजह से घर बिखर जायें।

रहे हम अपनी हद में सब्र से ,तो क्या हुआ हासिल?
चलो अब ये भी कर देखें; चलो हद से गुज़र जायें।

ये शंकर के मुरीदों की कतारें काँवरों वाली,
कभी रोटी की ख़ातिर भी तो सड़कों पर उतर जायें।

इधर मंदिर, उधर मस्जिद; इधर ज़िन्दाँ उधर सूली,
ख़िरदमंदों की बस्ती में जुनूँ वाले किधर जायें ।

प्रिये अधर से तुमने अपने

प्रिये अधर से तुमने अपने जब से किये अधर पर मेरे
हस्ताक्षर, तब से सपनों की बगिया और निखर आई है

आतुर हुई कामना भर ले यष्टि कमल को भुजपाशों में
आकाँक्षायें हैं सांसों की घुलें महक वाली सांसों में
नयनों की पुतली बन रांझा,चित्र हीर के बना रही है
नये रंग में नये रूप के मिले न जैसे इतिहासों में

देह तुम्हारी छूकर आई पुरबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है

लगी जागने भोर रूप की उजली धूप बाँह में लेकर
निशा संवरने लगी घटाओं से लहराते कुन्तल छूकर
नींदों वाली डोर थाम कर लगे झूलने झूला तारे
महकीं डगर, और अलगोजे लगे गूँजने चहुंदिशि भू पर

द्वार तुम्हारे से आ मलयज मेरी गलियों से जब गुजरी
मुझको लगा तुम्हारे नूतन संदेसे लेकर आई है

हुए तिरोहित एक निमिष में मन के मेरे संशय सारे
रातों में आ लगे जलाने दीपक पूनम के उजियारे
नदिया की लहरों सी पल पल लगीं उमड़ने मधुर उमंगें
एक तुम्हारी छवि रहती है बस नजरों में सांझ सकारे

स्वर से उपजी सरगम ने आ जब से छुआ गीत इक मेरा
लगा मुझे मेरे शब्दों में वीणा स्वयं उतर आई है

Sunday, September 28, 2008

अबकी बार

अबकी बार दिवाली में जब घर आएँगे मेरे पापा
खील, मिठाई, चप्पल, सब लेकर आएँगे मेरे पापा।

दादी का टूटा चश्मा और फटा हुआ चुन्नू का जूता,
दोनों की एक साथ मरम्मत करवाएँगे मेरे पापा।

अम्मा की धोती तो अभी नई है; होली पर आई थी;
उसको तो बस बातों में ही टरकाएंगे मेरे पापा।

जिज्जी के चेहरे की छोड़ो, उसकी आंखें तक पीली हैं;
उसका भी इलाज मंतर से करवाएँगे मेरे पापा।

बड़की हुई सयानी, उसकी शादी का क्या सोच रहे हो?
दादी पूछेंगी; और उनसे कतराएंगे मेरे पापा।

बौहरे जी के अभी सात सौ रुपये देने को बाकी हैं;
अम्मा याद दिलाएगी और हकलाएंगे मेरे पापा।

Saturday, September 27, 2008

डॉ अमर ज्योति का इस ब्लाग पर सह लेखक रूप में स्वागत है !

नाम:-अमर ज्योति "नदीम" M।A।(Eng।),M.A.(Hindi),Ph.D(English)(आगरा विश्वविद्यालय) व्यवसाय:- विभिन्न स्तरों पर अध्यापन के उपरांत ग्रामीण बैंकमें अधिकारी। फ़िलहाल एक बड़ी सड़क दुर्घटना के बाद लंबे समय से बिस्तर पर।रचनायें:- अधिकतर ग़ज़लें, कुछ गीत, कुछ अतुकांत कवितायें, कुछ लेख, फ़िट्ज़्जेरल्ड की रुबाइयात उमर ख़ैय्याम की कई रुबाइयों का हिंदी अनुवाद, एक खण्डकाव्य…।

आधुनिक लेखकों पर व्यंग्य करतीं ये लाइनें, राजा लिख याद दिलातीं हैं, डॉ अमर ज्योति की ! इन पंक्तियों को पढ़कर एक शब्दचित्र खिंच जाता है जिसमें एक लेखक को, लिखने का प्रयत्न करते देख, अमर कह रहें हैं.... तेरे पास लिखने के लिए और क्या है ? वही पुरानी राजा रानी की कहानी लिख ..ठहरे हुए पानी को तूफानी लिख, और जब देश में खून बहाया जा रहा हो तो उसमें भी रस घोल के कविता लिख ...

उनकी अधिकतर कवितायें कमजोरों और जीवन को ढोते हुए लोगों का प्रतिनिधित्व करती है ! उनकी हर ग़ज़ल, दर्द में तडपती हुई जिंदगियों की, हकीक़त दिखाती नज़र आती है !

उसने कभी भी पीर पराई नहीं सुनी कितना भला किया कि बुराई नहीं सुनी ...

सुबह-सवेरे एक गाँव की गरीब विधवा रज्जो की अम्मा की चिंता का जीवंत मार्मिक उदाहरण है... जिसे बार बार पढने का मन करता है ...

राम के मंदिर पर लिखते हुए अमर को अपने देश में कप प्लेट धोते लव कुश याद आ रहे हैं ! इनका पूछना है कि "रख सकेंगे क्या अंगूठे को बचा कर एकलव्य;रामजी के राज में शंबूक जी पायेंगे क्या!"

एक और बानगी देखिये- कि कुछ लोगों को शायर और कवियों के लिए पसंदीदा मौसम सावन और बदली छाये माहौल से दहशत होती है, बदली के छाने से .....यह भी जीवन है ! कितने लोग इनके बारे में सोचते हैं ?

डॉ अमर ज्योति random rumblings की रचना को एक बार पढ़ कर मन नही भरता ! हर रचना एक वास्तविक चित्रण करती है एक सच्चाई का जिसको हम आम जीवन में नज़रन्दाज़ करते हैं ! विनम्रता की हालत यह है, अपने परिचय में एक पूरी लाइन भी नही लिखी ! जनाब इंग्लिश साहित्य में Ph.D. हैं, और सेवा हिन्दी की कर रहे हैं ! डॉ अमर ज्योति जैसे स्वच्छ लेखक हिन्दी जगत की आंख में गुलाब जल के समान हैं जो बेहद शीतलता देते हैं !

Thursday, September 25, 2008

अंतिम गीत लिखे जाता हूँ |

विदित नहीं लेखनी उंगलियों का कल साथ निभाये कितना
इसीलिये मैं आज बरस का अंतिम गीत लिखे जाता हूँ

चुकते हुए दिनों के संग संग
आज भावनायें भी चुक लीं
ढलते हुए दिवस की हर इक
रश्मि, चिरागों जैसे बुझ ली
लगी टिमटिमाने दीपक की
लौ रह रह कर उठते गिरते
और भाव की जो अँगड़ाई थी,
उठने से पहले रुक ली

पता नहीं कल नींद नैन के कितनी देर रहे आँगन में
इसीलिये बस एक स्वप्न आँखों में और बुने जाता हूँ

लगता नहीं नीड़ तक पहुँचें,
क्षमता शेष बची पांवों में
चौपालें सारी निर्जन हैं
अब इन उजड़ चुके गांवों में
टूटे हुए पंख की सीमा
में सिमट पातीं परवाज़ें
घुली हुई है परछाईं ,
नंगे करील की अब छांहों में

पता नहीं कल नीड़ पंथ को दे पाथेय नहीं अथवा दे
इसीलिये मैं आज राह का अंतिम मील चले जाता हूँ

गीतों का यह सफ़र आज तक
हुआ, कहाँ निश्चित कल भी हो
धुला हुआ है व्योम आज जो,
क्या संभव है यह कल भी हो
सुधि के दर्पण में दरारें पड़ें,
कौन यह कह सकता है ?
जितना है विस्तार ह्रदय का आज,

भला उतना कल भी हो ?

पता नहीं कल धूप, गगन की चादर को कितना उजियारे
इसीलिये मैं आज चाँद को करके दीप धरे जाता हूँ

है सभी कुछ वही

एक दीपक वही जो कि जलते हुए
मेरे गीतों में करता रहा रोशनी
एक चन्दा वही, रात के खेत में
बीज बो कर उगाता रहा चाँदनी
एक पुरबा वही, मुस्कुराते हुए
जो कि फूलों का श्रन्गार करती रही
एक बुलबुल वही डाल पर बैठ जो
सरगमों में नये राग भरती रही

भोर भी है वही, औ वही साँझ है
सिर्फ़, लगता है मैं ही बदलने लगा

जो संदेसा सुबह ने था आके दिया
आवरण था नया, बात थी पर वही
हैं वही चंद उलझे हुए फ़लसफ़े
है कहानी वही जो रही अनकही
है वही धूप गुडमुड सी लटकी हुई
अलगनी के अकेले उसी छोर पर
है वही एक खामोश पल वक्त का
मुँह छुपाता, गली के खडा मोड पर

मंज़िलें भी वही, राह भी है वही
सिर्फ़ निश्चय सफ़र का बदलने लगा

है धुआँसा धुआँसा वही आँगना
वो ही कुहरे में लिपटा हुआ गाँव है
वो ही साकी, वही मयकदा है, वही
लडखडाते, सँभलते हुए पाँव हैं
वो ही दहलीज आतुर बिछाये नयन
आस पग चुम्बनों की सजाये हुए
और यायावरी एक जोगी वही
धूनी पीपल के नीचे रमाये हुए

रंग भी हैं वही, कैनवस भी वही
तूलिका का ही तेवर बदलने लगा

शब्द चितेरे राकेश खंडेलवाल का "कुछ ग़ज़ल कुछ गीत" पर स्वागत हैं !


ब्लॉग जगत में फैले वैमनस्य और नफरत के जहर से दुखी होकर जब मैंने " वे नफरत बाँटें इस जग में हम प्यार लुटाने बैठे हैं ! !" पोस्ट लिखी समय मेरी इस रचना और संवेदना को ब्लॉग जगत के तमाम सम्मानित लेखकों ने आकर जो सम्मान दिया उससे मैं बेहद अभिभूत हुआ, राकेश खंडेलवाल ने जिस अपनत्व से अपनी प्रतिक्रिया और हौसला दिया वह एक नया उदाहरण होना चाहिए ब्लाग जगत के लिए ! मैं यह देख कर भौचक्का रह गया कि उनकी प्रतिक्रिया के बिना यह ख़त अधूरा था जिसे राकेश जी ने आकर पूरा किया !

...वे शंकित, कुंठित मन लेकर,
कुछ पत्थर हम पर फ़ेंक गए
हम समझ नही पाए, हमको
क्यों मारा ? इस बेदर्दी से ,
हम चोटें लेकर भी दिल पर, अरमान लगाये बैठे हैं !

......क्या शिकवा है क्या हुआ तुम्हे
क्यों आँख पे पट्टी बाँध रखी,
क्यों नफरत लेकर, तुम दिल में
रिश्ते, परिभाषित करती हो,
हम पुरूष ह्रदय, सम्मान सहित, कुछ याद दिलाने बैठे हैं....

राकेश जी ने इस ख़त को कुछ इस तरह पूरा किया ...

"जब भी कुछ फ़ूटा अधरों से
तब तब ही उंगली उठी यहाँ
जो भाव शब्द के परे रहे, वे
कभी किसी को दिखे कहाँ
यह वाद नहीं प्रतिवाद नहीं
मन की उठती धारायें हैं,
ले जाये नाव दूसरे तट, हम पाल चढ़ाये बैठे हैं !"

अद्वितीय शब्द संयोजन के धनी इस विनम्र महारथी ने " कुछ ग़ज़ल कुछ गीत " पर सह लेखक बन कर जो सम्मान दिया है हम डॉ अमर ज्योति और सतीश सक्सेना उनके आभारी हैं !