Thursday, September 25, 2008

है सभी कुछ वही

एक दीपक वही जो कि जलते हुए
मेरे गीतों में करता रहा रोशनी
एक चन्दा वही, रात के खेत में
बीज बो कर उगाता रहा चाँदनी
एक पुरबा वही, मुस्कुराते हुए
जो कि फूलों का श्रन्गार करती रही
एक बुलबुल वही डाल पर बैठ जो
सरगमों में नये राग भरती रही

भोर भी है वही, औ वही साँझ है
सिर्फ़, लगता है मैं ही बदलने लगा

जो संदेसा सुबह ने था आके दिया
आवरण था नया, बात थी पर वही
हैं वही चंद उलझे हुए फ़लसफ़े
है कहानी वही जो रही अनकही
है वही धूप गुडमुड सी लटकी हुई
अलगनी के अकेले उसी छोर पर
है वही एक खामोश पल वक्त का
मुँह छुपाता, गली के खडा मोड पर

मंज़िलें भी वही, राह भी है वही
सिर्फ़ निश्चय सफ़र का बदलने लगा

है धुआँसा धुआँसा वही आँगना
वो ही कुहरे में लिपटा हुआ गाँव है
वो ही साकी, वही मयकदा है, वही
लडखडाते, सँभलते हुए पाँव हैं
वो ही दहलीज आतुर बिछाये नयन
आस पग चुम्बनों की सजाये हुए
और यायावरी एक जोगी वही
धूनी पीपल के नीचे रमाये हुए

रंग भी हैं वही, कैनवस भी वही
तूलिका का ही तेवर बदलने लगा

5 comments:

Hem chander Pandey said...

मेरा इस कविता को कई बार पढने से भी मन नही भरा ! इतनी सुंदर कविता लेखन के लिए आपका धन्यवाद !

सतीश सक्सेना said...

राकेश भाई !
शब्दों से गीतों का श्रंगार करने का जो वरदान आपने माँ शारदा से पाया है....हमारे पास तो इसको इज्ज़त बख्शने बाले शब्द तक नहीं हैं ! गीत-विद्यार्थियों को बरसों तक सिखाने के लिए आपने खजाना लिखा है , जो हमेशा हम सबको लाभान्वित करता रहेगा !
आभार इतनी सुंदर रचना के लिए !

Shastri said...

"रंग भी हैं वही, कैनवस भी वही
तूलिका का ही तेवर बदलने लगा "

दो पंक्तियों में कितना कुछ कह गये आप!! वाह!



-- शास्त्री जे सी फिलिप

-- बूंद बूंद से घट भरे. आज आपकी एक छोटी सी टिप्पणी, एक छोटा सा प्रोत्साहन, कल हिन्दीजगत को एक बडा सागर बना सकता है. आईये, आज कम से कम दस चिट्ठों पर टिप्पणी देकर उनको प्रोत्साहित करें!!

manvinder bhimber said...

जो संदेसा सुबह ने था आके दिया
आवरण था नया, बात थी पर वही
हैं वही चंद उलझे हुए फ़लसफ़े
है कहानी वही जो रही अनकही
है वही धूप गुडमुड सी लटकी हुई
अलगनी के अकेले उसी छोर पर
है वही एक खामोश पल वक्त का
मुँह छुपाता, गली के खडा मोड पर
behad khoobsurat.....pad pad kar man nahi bhara

राज भाटिय़ा said...

राकेश जी, धन्यवाद एक साफ़ सुधरी ओर भावपुरण कविता के लिये