Sunday, September 28, 2008

अबकी बार

अबकी बार दिवाली में जब घर आएँगे मेरे पापा
खील, मिठाई, चप्पल, सब लेकर आएँगे मेरे पापा।

दादी का टूटा चश्मा और फटा हुआ चुन्नू का जूता,
दोनों की एक साथ मरम्मत करवाएँगे मेरे पापा।

अम्मा की धोती तो अभी नई है; होली पर आई थी;
उसको तो बस बातों में ही टरकाएंगे मेरे पापा।

जिज्जी के चेहरे की छोड़ो, उसकी आंखें तक पीली हैं;
उसका भी इलाज मंतर से करवाएँगे मेरे पापा।

बड़की हुई सयानी, उसकी शादी का क्या सोच रहे हो?
दादी पूछेंगी; और उनसे कतराएंगे मेरे पापा।

बौहरे जी के अभी सात सौ रुपये देने को बाकी हैं;
अम्मा याद दिलाएगी और हकलाएंगे मेरे पापा।

12 comments:

रंजन said...

बहुत खुब.. सजीव चित्रण किया आपने..

MANVINDER BHIMBER said...

अबकी बार दिवाली में जब घर आएँगे मेरे पापा
खील, मिठाई, चप्पल, सब लेकर आएँगे मेरे पापा।
दादी का टूटा चश्मा और फटा हुआ चुन्नू का जूता,
दोनों की एक साथ मरम्मत करवाएँगे मेरे पापा।
kitna sahi chitrn kiya hai.....sunder

दीपक said...

बहुत सुंदर चित्रण !! दिल को छु गयी आपकी बात

सतीश सक्सेना said...

बेबसी के करुण चित्रण की इस विशेषता के कारण,आप उन लोगों की तरफ़,सबका ध्यान खीचने में सफल रहे हैं, जिनकी तरफ़ कोई देखता तक नही ! आपको प्रणाम !

Anonymous said...

aisa laga jaise meri kahani aap ko pata lag gai.

govind goyal said...

uf kya likh diya mere bhai
govind goyal sriganganagar

राज भाटिय़ा said...

आप की यह कविता पढ कर आंखो मे आसंऊ आ गये, बहुत से परिवार मिलते हे जो इस से भी बदतर स्थिति मे रहने को मजबुर हे,
धन्यवाद

Dr. Amar Jyoti said...

मेरी बात आपके मन तक पहुंची। कृतकृत्य हुआ। आप सब की संवेदना को सलाम।

Prakash singh "Arsh" said...

bebasi ka aisa chitran aaj tak maine nahi padha tha kahin ,bahot hi dard bhara hai aankhen nam ho gai..... bahot hi gahara esas dala hai aapne..

sundar rachna ke liye aapko bahot bahot badhai...aur han aap mere blog pe aaye uske liye v bahot bahot sukriya....

regards

Udan Tashtari said...

क्या गजब चित्रण किया है भई!! भावुक कर दिया इस बेबसी ने.

seema gupta said...

बड़की हुई सयानी, उसकी शादी का क्या सोच रहे हो?
दादी पूछेंगी; और उनसे कतराएंगे मेरे पापा।
" what a great expression, jub bhee papa bhar se aatey hain to ghr walon ko yhee ummedeyn hottee hain, aapne sbhee ko shabdon se jadu mey bandh diya hai, behtreen"

Regards

rakhshanda said...

बड़की हुई सयानी, उसकी शादी का क्या सोच रहे हो?
दादी पूछेंगी; और उनसे कतराएंगे मेरे पापा।

बौहरे जी के अभी सात सौ रुपये देने को बाकी हैं;
अम्मा याद दिलाएगी और हकलाएंगे मेरे पापा।

शोखी तो है ही लेकिन इसके पीछे कितना दर्द छिपा है,ये महसूस ही किया जा सकता है, खालिस और सादगी का लिबास पहने आपकी ये नज़्म सच,, दिल को छू गई...ऐसे लगा किसी आम से घर का कोई मंज़र देख लिया हो...यही सादगी आपकी खासियत है...बहुत खूब