Tuesday, September 30, 2008

प्रिये अधर से तुमने अपने

प्रिये अधर से तुमने अपने जब से किये अधर पर मेरे
हस्ताक्षर, तब से सपनों की बगिया और निखर आई है

आतुर हुई कामना भर ले यष्टि कमल को भुजपाशों में
आकाँक्षायें हैं सांसों की घुलें महक वाली सांसों में
नयनों की पुतली बन रांझा,चित्र हीर के बना रही है
नये रंग में नये रूप के मिले न जैसे इतिहासों में

देह तुम्हारी छूकर आई पुरबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है

लगी जागने भोर रूप की उजली धूप बाँह में लेकर
निशा संवरने लगी घटाओं से लहराते कुन्तल छूकर
नींदों वाली डोर थाम कर लगे झूलने झूला तारे
महकीं डगर, और अलगोजे लगे गूँजने चहुंदिशि भू पर

द्वार तुम्हारे से आ मलयज मेरी गलियों से जब गुजरी
मुझको लगा तुम्हारे नूतन संदेसे लेकर आई है

हुए तिरोहित एक निमिष में मन के मेरे संशय सारे
रातों में आ लगे जलाने दीपक पूनम के उजियारे
नदिया की लहरों सी पल पल लगीं उमड़ने मधुर उमंगें
एक तुम्हारी छवि रहती है बस नजरों में सांझ सकारे

स्वर से उपजी सरगम ने आ जब से छुआ गीत इक मेरा
लगा मुझे मेरे शब्दों में वीणा स्वयं उतर आई है

8 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

दिनकर की उर्वशी की याद ताज़ा कर दी आपने-
'स्नेह का सौन्दर्य को उपहार …'
बधाई।

seema gupta said...

very soft kind of touching words

Regards

GIRISH BILLORE MUKUL said...

स्वर से उपजी सरगम ने आ जब से छुआ गीत इक मेरा
लगा मुझे मेरे शब्दों में वीणा स्वयं उतर आई है
adbhut shabd sanyojan pusht bhav
badhaiyaan

सतीश सक्सेना said...

"देह तुम्हारी छूकर आई पुरबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है"

अभिव्यक्तियों को जो रूप आप देते हैं, उस पर क्या प्रतिक्रिया दूँ ? बस हमेशा की तरह आज भी अद्वितीय !

rakhshanda said...

देह तुम्हारी छूकर आई पुरबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है

लगी जागने भोर रूप की उजली धूप बाँह में लेकर
निशा संवरने लगी घटाओं से लहराते कुन्तल छूकर
नींदों वाली डोर थाम कर लगे झूलने झूला तारे
महकीं डगर, और अलगोजे लगे गूँजने चहुंदिशि भू पर

बहुत सुंदर और उतना ही रोमांटिक...लफ्ज़ लफ्ज़ में प्यार और हुस्न का मिलाप दिल को छू जाता है, हिन्दी कविता भी इतनी सुंदर हो सकती है, पहली बार पता चला....ख़ास कर...देह तुम्हारी छूकर आई पुरबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है....को पढ़ कर..एक पाकीजा जज़्बात का अहसास होता है...आप ने सुना होगा शकील बदायूनी का वो यादगार गीत....जिस में मुहब्बत और जज़्बात की पाकीज़गी हैरान करती है...तेरे साए को बना कर मैं हसीं ताज महल, चांदनी रात में नज़रों से तुझे प्यार करूँ...आज के इस दौर में ऐसी पाकीज़गी कहाँ है?

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर लिखा है .दिल को छू लेती है यह पंक्तियाँ

रंजना said...

श्रृंगार रस में सराबोर अतिसुन्दर मनमोहक पंक्तिया.

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!! एक दम तरल-सीधे दिल में उतर गई!! वाह!!