Tuesday, September 30, 2008

दवा-ए-दर्द-ए-दिल

दवा-ए-दर्द-ए-दिल के नाम पर अब ये भी कर जायें;
किसी के दुख में शामिल हों,किसी मुफ़लिस के घर जायें।

ये शेख़-ओ-बिरहमन का दौर है; इसमें यही होगा
कि मस्जिद और शिवालों की वजह से घर बिखर जायें।

रहे हम अपनी हद में सब्र से ,तो क्या हुआ हासिल?
चलो अब ये भी कर देखें; चलो हद से गुज़र जायें।

ये शंकर के मुरीदों की कतारें काँवरों वाली,
कभी रोटी की ख़ातिर भी तो सड़कों पर उतर जायें।

इधर मंदिर, उधर मस्जिद; इधर ज़िन्दाँ उधर सूली,
ख़िरदमंदों की बस्ती में जुनूँ वाले किधर जायें ।

8 comments:

डॉ .अनुराग said...

रहे हम अपनी हद में सब्र से ,तो क्या हुआ हासिल?
चलो अब ये भी कर देखें; चलो हद से गुज़र जायें।

बहुत खूब......ये शेर पसंद आया

seema gupta said...

दवा-ए-दर्द-ए-दिल के नाम पर अब ये भी कर जायें;
किसी के दुख में शामिल हों,किसी मुफ़लिस के घर जायें।
' full of human thought, wonderful'

regards

सतीश सक्सेना said...

मज़ा आगया साहब !, बड़े मौके से लिखा है !
एक अनुरोध है, जो शब्द आम बोलचाल में न हों उनका अनुवाद सबसे नीचे की लाइन में दे दें तो समझने में सुविधा होगी !

राकेश खंडेलवाल said...

ये शंकर के मुरीदों की कतारें काँवरों वाली,
कभी रोटी की ख़ातिर भी तो सड़कों पर उतर जायें।

बहुत खूब. दाद कबूलें

Udan Tashtari said...

वाह! बहुत सुन्दर.

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर भाव
धन्यवाद

deej said...

बहुत खूब......बहुत सुन्दर.......

vipinkizindagi said...

बहुत खूब...बहुत सुन्दर...