Thursday, September 25, 2008

अंतिम गीत लिखे जाता हूँ |

विदित नहीं लेखनी उंगलियों का कल साथ निभाये कितना
इसीलिये मैं आज बरस का अंतिम गीत लिखे जाता हूँ

चुकते हुए दिनों के संग संग
आज भावनायें भी चुक लीं
ढलते हुए दिवस की हर इक
रश्मि, चिरागों जैसे बुझ ली
लगी टिमटिमाने दीपक की
लौ रह रह कर उठते गिरते
और भाव की जो अँगड़ाई थी,
उठने से पहले रुक ली

पता नहीं कल नींद नैन के कितनी देर रहे आँगन में
इसीलिये बस एक स्वप्न आँखों में और बुने जाता हूँ

लगता नहीं नीड़ तक पहुँचें,
क्षमता शेष बची पांवों में
चौपालें सारी निर्जन हैं
अब इन उजड़ चुके गांवों में
टूटे हुए पंख की सीमा
में सिमट पातीं परवाज़ें
घुली हुई है परछाईं ,
नंगे करील की अब छांहों में

पता नहीं कल नीड़ पंथ को दे पाथेय नहीं अथवा दे
इसीलिये मैं आज राह का अंतिम मील चले जाता हूँ

गीतों का यह सफ़र आज तक
हुआ, कहाँ निश्चित कल भी हो
धुला हुआ है व्योम आज जो,
क्या संभव है यह कल भी हो
सुधि के दर्पण में दरारें पड़ें,
कौन यह कह सकता है ?
जितना है विस्तार ह्रदय का आज,

भला उतना कल भी हो ?

पता नहीं कल धूप, गगन की चादर को कितना उजियारे
इसीलिये मैं आज चाँद को करके दीप धरे जाता हूँ

10 comments:

manvinder bhimber said...

गीतों का यह सफ़र आज तक
हुआ, कहाँ निश्चित कल भी हो
धुला हुआ है व्योम आज जो,
क्या संभव है यह कल भी हो
सुधि के दर्पण में न दरारें पड़ें,
कौन यह कह सकता है ?
जितना है विस्तार ह्रदय का आज,
भला उतना कल भी हो ?
bahut sunder

परमजीत बाली said...

बहुत ही बेहतरीन रचना है। बहुत सुन्दर!!

लगता नहीं नीड़ तक पहुँचें,
क्षमता शेष बची पांवों में
चौपालें सारी निर्जन हैं
अब इन उजड़ चुके गांवों में
टूटे हुए पंख की सीमा
में न सिमट पातीं परवाज़ें
घुली हुई है परछाईं ,
नंगे करील की अब छांहों में

सतीश सक्सेना said...

जीवन का यथार्थ लिखा है आपने, अधिकतर हम अपने गुजरे कल के कष्टों को याद कर के दुखी रहते हैं , आज को जीने की अच्छी शिक्षा दी है आपने !

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर , आप ने आज को खुल कर जीया हे कल का कया पता.
धन्यवाद एक सुन्दर कविता के लिये

Anwar Qureshi said...

लिखते रहिये ..आप को पढना बहुत अच्छा लगता है ...

Anil Pusadkar said...

अद्भुत रचना

sethu said...

very nice poem!

शोभा said...

बहुत सुंदर लिखा है. सस्नेह.

Dr. Amar Jyoti said...

'पता नहीं कल नींद…'
अनिर्वचनीय सौन्दर्य!
हार्दिक बधाई।

A.k.verma said...

itni achhi kavita aajkal padhne ko nahi miltee. dhanyvad apka.