Tuesday, October 28, 2008

दीप पर्व

दीप का यह पर्व मन के द्वार पर आ रोशनी पल पल जगाये
और पथ में कोई भी अवरोध आने से प्रथम अवसान पाये
स्वप्न जो संवरा नयन में, शिल्प में ढल सामने आ मुस्कुराये
जो ह्रदय से उठ रही हैं कीजिये स्वीकार मंगल कामनायें

सादर,

राकेश खंडेलवाल

Friday, October 24, 2008

घने बनों में

घने बनों में शहर का पता कहीं न मिला;
भरी थी नाव, मगर नाख़ुदा कहीं न मिला।

लिखी थी किसने ये उलझी सी ज़िन्दगी की ग़ज़ल!
कोई रदीफ़, कोई काफ़िया कहीं न मिला।

महँत बैठे थे काबिज़ सभी शिवालों में;
बहुत पुकारा मगर देवता कहीं न मिला।

सुना तो था कि इसी राह से वो गुज़रे थे,
तलाश करते रहे; नक्श-ए-पा कहीं न मिला।

सफ़र हयात का तनहा ही काट आये नदीम;
लगे जो अपना सा वो काफ़िला कहीं न मिला।

Tuesday, October 21, 2008

मौन की अपराधिनी

शब्द की अँगनाईयों में गीत अब भटके हुए हैं
अलगनी पर नैन की बस अश्रु ही अटके हुए हैं

जानता हूँ मौन की अपराधिनी तो रागिनी है
जो न उसके बंधनों को गूँज देकर खोल पाई
और पग पत्थर बने, यह पायलों को श्रेय जाता
जो न पल भर थाम उनको नॄत्य में थी झनझनाई
अनलिखे हर गीत का दायित्व ढोती लेखनी ये
बाँझ होकर दे न पाई ज़िन्दगी कोई गज़ल को
पॄष्ठ जिम्मेदार हैं इतिहास के, पंचांग के भी
जोड़ पाये न गुजरते आज से आगत सकल को

किन्तु है आक्षेप का बोझा उठाये कौन बोलो
पोटली को सब पथिक अब राह पर पटके हुए हैं

क्या विदित तुमको अँधेरा ही नहीं दोषी तिमिर का
दीप की लौ भी ,उसे जो रोशनी दे न सकी है
हर लहर जिसने डुबोयी नाव, है सहभागिनी उस
एक ही पतवार की ,धारा नहीं जो खे सकी है
कूचियों के साथ शामिल व्यूह में हैं रंग सारे
जो क्षितिज के कैनवस को चित्र कोई दे न पाये
पुष्प की अक्षम्यता का ज़िक्र करना है जरूरी
प्रिय अधर के पाटलों पर जो न आकर मुस्कुराये

पांव जिनके पनघटों की राह पर थिरके हमेशा
आज उनके पथ तॄषाऒ के सघन तट के हुए हैं

Friday, October 17, 2008

बादल,तितली, धूप

बादल, तितली, धूप, घास, पुरवाई में
किसका चेहरा है इनकी रानाई में?

तुम तो कहते थे हर रिश्ता टूट चुका!
फ़िर क्यों रोए रातों को तन्हाई में?

वो साहिल की रेत देख कर लौट गया;
काश! उतरता दरिया की गहराई में.

पत्थर इतने आए लहूलुहान हुई;
ज़ख्मी कोयल क्या कूके अमराई में.

दिल और आँखें दोनों ही भर आते हैं
किसने इतना दर्द भरा शहनाई में?

Tuesday, October 14, 2008

ओस की बून्द ने

हर दिवस हो गया हीरकनियों जड़ा, मोरपंखी हुई मेरी हर शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

रात भर थी टपकती हुई चाँदनी को पिरोती रही भोर की धूप में
गंध को घोल कर स्याहियां फिर बना थरथराते अधर की कलम में भरा
रोशनी की पिघलती हुई इक किरण पांव को चूमने के लिये बिछ गई
जब बही धूप ने था कलम से निकल नाम चुम्बन से इक पंखुड़ी पर जड़ा

एक पल वह सपन का शिलालेख बन, नैन के पाटलों पर सुबह शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

झील में से उठी इक उनींदी लहर राग नूतन अचानक लगी छेड़ने
सात रंगो भरा भोर का बिम्ब तब पंखुड़ी बन गई जिस निमिष आईना
नरगिसी हो क्षितिज लीन होने लगा सूर्य के चक्र की रुक गई फिर गति
जगमगाती हुई दीप्ति से जो घिरा नाम उठ कर खड़ा हो गया आँगना

अंत-आरंभ-सुध-बुध बिसर कर गये नाम के पास ये मेरा अनुमान है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

तारकों की सघन छांह में थे उगे कल्पना के हठीले निमिष रात भर
एक मुट्ठी हवा, गुनगुनाती रही बाँसुरी पे मचलती हुई रागिनी
वक्त खाकों को आकार करता रहा चाँदनी में भिगो, बदलियां कात कर
और प्राची की उंगली पकड़ थी खड़ी तूलिका आतुरा और उन्मादिनी

स्वर्ण का एक प्रासाद जो बन गया, क्यारियों में वही पांचवा धाम है
ओस की बून्द ने पंखुड़ी पर लिखा, धूप से जब प्रिये ये तेरा नाम है

Saturday, October 11, 2008

बेवतन फ़कीरों से

बेवतन फ़कीरों से पूछना ठिकाना क्या?
इनको तो भटकना है, इनसे दोस्ताना क्या?

दर्द कह के क्या कीजे, दर्द सबकी दौलत है;
दर्द सब समझते हैं दर्द का सुनाना क्या?

ख़ामशी के सहरा में गुफ़्तगू पे पहरे हैं;
फिर सवाल क्या करना,पूछना बताना क्या?

दर्द तो मुसलसल है, इसमें कब तलक रोएं!
हर ख़ुशी को जाना है, इसमें मुस्कराना क्या?

तुम तो जानते थे सब;तुमसे कह के क्या करते!
ग़ैर ग़ैर ही तो था; ग़ैर को बताना क्या?

Tuesday, October 7, 2008

ओ प्रवासी

ओ प्रवासी

उग रहे आकार अम्बर में मरुस्थल के भ्रमों से
कल्पना की हर छुअन, पर हो गई रह कर हवा सी
कब तलक यों पीर की अंगनाईयों में कसमसाता
दूर हो परिवेश से अपने रहेगा ? ओ प्रवासी

ज़िन्दगी की इस चकई का खींचता है कौन धागा
कौन दे सन्देस छत पर भेजता है रोज कागा
कौन सी कठपुतलियों के हाथ की रेखा बना है
उलझनों में और उलझा जा रहा है मन अभागा

साध उलझे केश सी पगडंडियों में छटपटाती
मिल सके छाई अमावस को किसी दिन पूर्णमासी

उंगलियों को कौन थामे ही बिना देता दिशायें
कौन कहता है घटित जो है करे वह मंत्रणायें
संकुचित कर दायरों में दॄष्टि को बन्दी बना कर
कौन कहता है क्षितिज के पार हैं संभावनायें

घेरती हैं एक ऊहापोह में सुईयां घड़ी की
क्या भरेगी आंजुरि में आस की चुटकी जरा सी

धार के प्रतिकूल जाती नाव पर नाविक अकेला
थक रहा है बाऊलों के गीत को दे रोज हेला
चाहता है छोड़ना पतवार पर घेरे विवशता
फिर थमाता हाथ में चप्पू प्लावित कोई रेला

चक्र में आरोह के अवरोह के आधार खोकर
चल रही है, सांस पल पल पर हुई है अनमनासी

खुल रही पुस्तक दिवस की पॄष्ठ रहते किन्तु कोरे
संचयों को शब्द दें, पहले उड़ा लेते झकोरे
सांझ की पठनीयता के भाग में बस शून्य रहता
और कहती चल पुन: तू आस्था अपनी संजो रे
पौष की चौथी निशा में घिर रहे गहरे कुहासे
की घनेरी चादरों में कामना जाती समा सी

कट चुकी हैं जो पतंगें, कौन उनकी डोर थामे
स्वप्न होवे स्नात कोई भोर की धुंधली विभा में
आगतों के प्रश्न का उत्तर, विगत ही सौंप जाये
ज्योत्सना उगती रहे, हर बार की घिरती अमा में

आस बोती बीज, यद्दपि जानती उनकी नियति है
उग चुके दिन के दिये की बुझ रही धूमिल शिखा सी