Tuesday, October 7, 2008

ओ प्रवासी

ओ प्रवासी

उग रहे आकार अम्बर में मरुस्थल के भ्रमों से
कल्पना की हर छुअन, पर हो गई रह कर हवा सी
कब तलक यों पीर की अंगनाईयों में कसमसाता
दूर हो परिवेश से अपने रहेगा ? ओ प्रवासी

ज़िन्दगी की इस चकई का खींचता है कौन धागा
कौन दे सन्देस छत पर भेजता है रोज कागा
कौन सी कठपुतलियों के हाथ की रेखा बना है
उलझनों में और उलझा जा रहा है मन अभागा

साध उलझे केश सी पगडंडियों में छटपटाती
मिल सके छाई अमावस को किसी दिन पूर्णमासी

उंगलियों को कौन थामे ही बिना देता दिशायें
कौन कहता है घटित जो है करे वह मंत्रणायें
संकुचित कर दायरों में दॄष्टि को बन्दी बना कर
कौन कहता है क्षितिज के पार हैं संभावनायें

घेरती हैं एक ऊहापोह में सुईयां घड़ी की
क्या भरेगी आंजुरि में आस की चुटकी जरा सी

धार के प्रतिकूल जाती नाव पर नाविक अकेला
थक रहा है बाऊलों के गीत को दे रोज हेला
चाहता है छोड़ना पतवार पर घेरे विवशता
फिर थमाता हाथ में चप्पू प्लावित कोई रेला

चक्र में आरोह के अवरोह के आधार खोकर
चल रही है, सांस पल पल पर हुई है अनमनासी

खुल रही पुस्तक दिवस की पॄष्ठ रहते किन्तु कोरे
संचयों को शब्द दें, पहले उड़ा लेते झकोरे
सांझ की पठनीयता के भाग में बस शून्य रहता
और कहती चल पुन: तू आस्था अपनी संजो रे
पौष की चौथी निशा में घिर रहे गहरे कुहासे
की घनेरी चादरों में कामना जाती समा सी

कट चुकी हैं जो पतंगें, कौन उनकी डोर थामे
स्वप्न होवे स्नात कोई भोर की धुंधली विभा में
आगतों के प्रश्न का उत्तर, विगत ही सौंप जाये
ज्योत्सना उगती रहे, हर बार की घिरती अमा में

आस बोती बीज, यद्दपि जानती उनकी नियति है
उग चुके दिन के दिये की बुझ रही धूमिल शिखा सी

6 comments:

सतीश सक्सेना said...

"ज़िन्दगी की इस चकई का खींचता है कौन धागा
कौन दे सन्देस छत पर भेजता है रोज कागा
कौन सी कठपुतलियों के हाथ की रेखा बना है
उलझनों में और उलझा जा रहा है मन अभागा"

प्रवासी भारतीयों का दर्द, गीतकार राकेश खंडेलवाल से अधिक कौन व्यक्त कर सकता है ? मानवीय संवेदना से ओतप्रोत, अपने बसेरे की यादें, इस गीत को और मोहक बना रहीं हैं ! और शब्दों का चयन तो राकेश जी की विशिष्टता है ही !

seema gupta said...

खुल रही पुस्तक दिवस की पॄष्ठ रहते किन्तु कोरे
संचयों को शब्द दें, पहले उड़ा लेते झकोरे
सांझ की पठनीयता के भाग में बस शून्य रहता
और कहती चल पुन: तू आस्था अपनी संजो रे
पौष की चौथी निशा में घिर रहे गहरे कुहासे
की घनेरी चादरों में कामना जाती समा सी
"bhut hee sunder abheevykte, apno se dur rehne walon ke yaden or dard ......ko bhut shee shabd mile hain is geet mey'

regards

Dr. Amar Jyoti said...

प्रवासी मन की मूक कसक को शब्द दिये हैं आपने। बधाई।

Udan Tashtari said...

आह्ह्!! निकली, फिर वाह्ह्!! बहुत ही उम्दा सत्य अभिव्यक्ति!!

Shar said...

ज़िन्दगी की इस चकई का खींचता है कौन धागा
कौन दे सन्देस छत पर भेजता है रोज कागा
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धार के प्रतिकूल जाती नाव पर नाविक अकेला
थक रहा है बाऊलों के गीत को दे रोज हेला
चाहता है छोड़ना पतवार पर घेरे विवशता
फिर थमाता हाथ में चप्पू प्लावित कोई रेला
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कट चुकी हैं जो पतंगें, कौन उनकी डोर थामे
स्वप्न होवे स्नात कोई भोर की धुंधली विभा में
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ये पन्क्तियाँ बेशकीमती हैं। पूरी कविता ही बहुत अच्छी है!

राज भाटिय़ा said...

क्या बात है प्रवासी का दर्द तो प्रवासी ही जान सकता है.
धन्यवाद