Saturday, October 11, 2008

बेवतन फ़कीरों से

बेवतन फ़कीरों से पूछना ठिकाना क्या?
इनको तो भटकना है, इनसे दोस्ताना क्या?

दर्द कह के क्या कीजे, दर्द सबकी दौलत है;
दर्द सब समझते हैं दर्द का सुनाना क्या?

ख़ामशी के सहरा में गुफ़्तगू पे पहरे हैं;
फिर सवाल क्या करना,पूछना बताना क्या?

दर्द तो मुसलसल है, इसमें कब तलक रोएं!
हर ख़ुशी को जाना है, इसमें मुस्कराना क्या?

तुम तो जानते थे सब;तुमसे कह के क्या करते!
ग़ैर ग़ैर ही तो था; ग़ैर को बताना क्या?

6 comments:

शोभा said...

बेवतन फ़कीरों से पूछना ठिकाना क्या?
इनको तो भटकना है, इनसे दोस्ताना क्या?

दर्द कह के क्या कीजे, दर्द सबकी दौलत है;
दर्द सब समझते हैं दर्द का सुनाना क्या?
वाह! बहुत सुंदर लिखा है

सतीश सक्सेना said...

यह नज़्म पढ़ कर एक शेर याद आ गया !

"जिंदगी जिंदादिली का नाम है !
मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं !"

क्या सूफियाना अंदाज़ है अमर भाई !

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया रचना लिखी है।बधाई।

दर्द तो मुसलसल है, इसमें कब तलक रोएं!
हर ख़ुशी को जाना है, इसमें मुस्कराना क्या?

Rachna Singh said...

बेवतन फ़कीरों से पूछना ठिकाना क्या?
इनको तो भटकना है, इनसे दोस्ताना क्या?

bahut hii sunder
dard ko itni mohabbat sae vahi likh saktaa haen jiska rishta puran haen dard sae . bahuto kae yahaan aata haen dard mehmaa bankar , jaata hae phir jaan laekar

राज भाटिय़ा said...

बेवतन फ़कीरों से पूछना ठिकाना क्या?
इनको तो भटकना है, इनसे दोस्ताना क्या?
बहुत खुब मत करो दोस्ताना लेकिन हम तो जरुर करेगे भाई
धन्यवाद

Shar said...

अमर जी,
अच्छी लगी गजल !
कुछ बहुत पुराना पढा याद आया, पता नहीं किन का लिखा है।
जिनका है उन्हें नमन ।
"सभी नगमात उँचे कंठ से गाये नहीं जाते,
जिगर के जख्म चौराहे पे दिखलाये नहीं जाते"