Tuesday, October 14, 2008

ओस की बून्द ने

हर दिवस हो गया हीरकनियों जड़ा, मोरपंखी हुई मेरी हर शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

रात भर थी टपकती हुई चाँदनी को पिरोती रही भोर की धूप में
गंध को घोल कर स्याहियां फिर बना थरथराते अधर की कलम में भरा
रोशनी की पिघलती हुई इक किरण पांव को चूमने के लिये बिछ गई
जब बही धूप ने था कलम से निकल नाम चुम्बन से इक पंखुड़ी पर जड़ा

एक पल वह सपन का शिलालेख बन, नैन के पाटलों पर सुबह शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

झील में से उठी इक उनींदी लहर राग नूतन अचानक लगी छेड़ने
सात रंगो भरा भोर का बिम्ब तब पंखुड़ी बन गई जिस निमिष आईना
नरगिसी हो क्षितिज लीन होने लगा सूर्य के चक्र की रुक गई फिर गति
जगमगाती हुई दीप्ति से जो घिरा नाम उठ कर खड़ा हो गया आँगना

अंत-आरंभ-सुध-बुध बिसर कर गये नाम के पास ये मेरा अनुमान है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

तारकों की सघन छांह में थे उगे कल्पना के हठीले निमिष रात भर
एक मुट्ठी हवा, गुनगुनाती रही बाँसुरी पे मचलती हुई रागिनी
वक्त खाकों को आकार करता रहा चाँदनी में भिगो, बदलियां कात कर
और प्राची की उंगली पकड़ थी खड़ी तूलिका आतुरा और उन्मादिनी

स्वर्ण का एक प्रासाद जो बन गया, क्यारियों में वही पांचवा धाम है
ओस की बून्द ने पंखुड़ी पर लिखा, धूप से जब प्रिये ये तेरा नाम है

9 comments:

हरि said...

भावपूर्ण गीत। बधाई।

Mrs. Asha Joglekar said...

प्यार भरा प्यारा सा गीत । बधाई ।

मीत said...

एक पल वह सपन का शिलालेख बन, नैन के पाटलों पर सुबह शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

स्वर्ण का एक प्रासाद जो बन गया, क्यारियों में वही पांचवा धाम है
ओस की बून्द ने पंखुड़ी पर लिखा, धूप से जब प्रिये ये तेरा नाम है

क्या कहूँ ? आप तो ...... भाई मैं बस महसूस कर सकने भर का सामर्थ्य रखता हूँ.

seema gupta said...

झील में से उठी इक उनींदी लहर राग नूतन अचानक लगी छेड़ने
सात रंगो भरा भोर का बिम्ब तब पंखुड़ी बन गई जिस निमिष आईना
नरगिसी हो क्षितिज लीन होने लगा सूर्य के चक्र की रुक गई फिर गति
जगमगाती हुई दीप्ति से जो घिरा नाम उठ कर खड़ा हो गया आँगना
"bhut sunder or sunder geet, behtreen"

Regards

Dr. Amar Jyoti said...

प्रेम और प्रकृति का अद्भुत चित्रण!

Anonymous said...

एक तुम्हारी ही आवाज सुन के खिले
जतन सारे भंवरों के नाकाम हैं,
उस कली को कहें क्या ए माली बता
जो हँस के कहे गुल मेरा नाम है !

सतीश सक्सेना said...

"स्वर्ण का एक प्रासाद जो बन गया,
क्यारियों में वही पांचवा धाम है "

गज़ब की कल्पना है आपकी ! भाई जी !

Shar said...

बहुत-बहुत सुन्दर रचना! दो-तीन बार पढी! बहुत रस आया !
ये देख के खुशी हुई कि कुछ दिनों पहले जो ओस की बूंद तार पे जा अटकी थी और जिस पंखुडी के परिश्रम व्यथा रह गये थे, उन्हें अपना मुकाम मिला :)
एक बात बताईये, क्या आप के घर में कोई बागीचा है, या आप Green Peace के सदस्य हैं जो प्रकृति आप से इतनी बात करती है।

मैं सुबह उठती हूँ तो ये ओस की बूँद कहाँ जाती है?? क्यों मेरी कविताएं नहीं भीगतीं इससे :(

अच्छा, अगर लिखना हो कि आप की कविता में हर भाव मिलते हैं A to Z तो इसे हिन्दी में कैसे लिखूँ ?

गुरुजी, बहुत धन्यवाद इस प्यारी कविता के लिये और प्रणाम !

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर, भाव से भरपुर धन्यवाद