Friday, October 17, 2008

बादल,तितली, धूप

बादल, तितली, धूप, घास, पुरवाई में
किसका चेहरा है इनकी रानाई में?

तुम तो कहते थे हर रिश्ता टूट चुका!
फ़िर क्यों रोए रातों को तन्हाई में?

वो साहिल की रेत देख कर लौट गया;
काश! उतरता दरिया की गहराई में.

पत्थर इतने आए लहूलुहान हुई;
ज़ख्मी कोयल क्या कूके अमराई में.

दिल और आँखें दोनों ही भर आते हैं
किसने इतना दर्द भरा शहनाई में?

12 comments:

नीरज गोस्वामी said...

अमर जी...बहुत उम्दा रचना...हर शेर लाजवाब है और आपने बहुत विलक्षण प्रयोग किए हैं नए बिम्बों के माध्यम से...वाह...और ये शेर तो बस कमाल है:
पत्थर इतने आए लहूलुहान हुई;
ज़ख्मी कोयल क्या कूके अमराई में.
कितनी तारीफ करूँ?...मन नहीं भर रहा...
नीरज

Satish Saxena said...

तुम तो कहते थे हर रिश्ता टूट चुका!
फ़िर क्यों रोए रातों को तन्हाई में?

दर्द की अथाह गहराई है इसमें ! आजकल ऐसी नज़्म देखने को नही मिलती !

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढिया रचना है।बधाई स्वीकारे।

तुम तो कहते थे हर रिश्ता टूट चुका!
फ़िर क्यों रोए रातों को तन्हाई में?

Vinay said...

बादल, तितली, धूप, घास, पुरवाई में
किसका चेहरा है इनकी रानाई में?

तुम तो कहते थे हर रिश्ता टूट चुका!
फ़िर(-->फिर) क्यों रोए रातों को तन्हाई में?

बहुत अच्छे, अमर जी।

chandrabhan bhardwaj said...

achhi gazal hai badhai


Chandrabhan Bhardwaj

रंजू भाटिया said...

वो साहिल की रेत देख कर लौट गया;
काश! उतरता दरिया की गहराई में.

बहुत खूब ...

विवेक सिंह said...

कितनी तारीफ करूँ?...लाजवाब है .है। बधाई स्वीकारे।

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर शेर, किस की तारीफ़ करे ओर किसे छोडे, सब एक से बढ कर एक.
धन्यवाद

Shar said...

अमर जी,
आज की रचना ने कमाल कर दिया। आपको अभी ही ई-कविता में पढना शुरू किया है, इसलिये ज्यादा तो नहीं जानती कि पहले आप क्या लिखा करते थे पर मेरे लिये आपका ये नया रूप है, बहुत खूब है! सादर बधाई स्वीकारें ।

राकेश खंडेलवाल said...

किस की करूँ प्रशंसा और किसे छोड़ूँ
बौर उगाईं हैं अद्भुत अँगनाई में

Unknown said...

अमर जी बहुत अच्छी है ..
तुम तो कहते थे हर रिश्ता टूट चुका!
फ़िर क्यों रोए रातों को तन्हाई में?
ये... लाइन दिल को एक चुबन दे जाती है...
धन्यवाद ...

Unknown said...

तुम तो कहते थे हर रिश्ता टूट चुका!
फ़िर क्यों रोए रातों को तन्हाई में?

वो साहिल की रेत देख कर लौट गया;
काश! उतरता दरिया की गहराई में.

क्या बात है साहब काबिले तारीफ अच्छा लिखने के लिये मेरी बधाई स्वीकरें।