Tuesday, October 21, 2008

मौन की अपराधिनी

शब्द की अँगनाईयों में गीत अब भटके हुए हैं
अलगनी पर नैन की बस अश्रु ही अटके हुए हैं

जानता हूँ मौन की अपराधिनी तो रागिनी है
जो न उसके बंधनों को गूँज देकर खोल पाई
और पग पत्थर बने, यह पायलों को श्रेय जाता
जो न पल भर थाम उनको नॄत्य में थी झनझनाई
अनलिखे हर गीत का दायित्व ढोती लेखनी ये
बाँझ होकर दे न पाई ज़िन्दगी कोई गज़ल को
पॄष्ठ जिम्मेदार हैं इतिहास के, पंचांग के भी
जोड़ पाये न गुजरते आज से आगत सकल को

किन्तु है आक्षेप का बोझा उठाये कौन बोलो
पोटली को सब पथिक अब राह पर पटके हुए हैं

क्या विदित तुमको अँधेरा ही नहीं दोषी तिमिर का
दीप की लौ भी ,उसे जो रोशनी दे न सकी है
हर लहर जिसने डुबोयी नाव, है सहभागिनी उस
एक ही पतवार की ,धारा नहीं जो खे सकी है
कूचियों के साथ शामिल व्यूह में हैं रंग सारे
जो क्षितिज के कैनवस को चित्र कोई दे न पाये
पुष्प की अक्षम्यता का ज़िक्र करना है जरूरी
प्रिय अधर के पाटलों पर जो न आकर मुस्कुराये

पांव जिनके पनघटों की राह पर थिरके हमेशा
आज उनके पथ तॄषाऒ के सघन तट के हुए हैं

10 comments:

anupam... kaafir said...

hausla afzaai ke liye shukriya...

aapke lekh padh raha tha main, aur kya khoob likha hai aapne...

नारदमुनि said...

najar ne najar se mulakat kar li
khamosh the dono magar bat kar li
ishk ki kheti ko jab sukha dekha
aankhon ne ro ro ke barsat kar li

Rachna Singh said...

rakesh ji
hamesha ki tarah sunder abhivyakti
regds

Shar said...

क्या गुरुजी आप किस दुख-दर्द में भटके हुये हैं
इतने सुन्दर गीत रचते,घूंटी क्या गटके हुये हैं?
हमें जब भी याद आती नेपथ्य से कोई पुरानी
शब्दों में उसको पिरोते याद आ जाती है नानी!
पर आप लेकर लेखनी किस चित्र में अटके हुये हैं
याद करिये शिष्य नये कुछ कक्षा में admit हुये हैं :)

manvinder bhimber said...

क्या विदित तुमको अँधेरा ही नहीं दोषी तिमिर का
दीप की लौ भी ,उसे जो रोशनी दे न सकी है
हर लहर जिसने डुबोयी नाव, है सहभागिनी उस
एक ही पतवार की ,धारा नहीं जो खे सकी है
कूचियों के साथ शामिल व्यूह में हैं रंग सारे
जो क्षितिज के कैनवस को चित्र कोई दे न पाये
पुष्प की अक्षम्यता का ज़िक्र करना है जरूरी
प्रिय अधर के पाटलों पर जो न आकर मुस्कुराये
bahut sunder

seema gupta said...

शब्द की अँगनाईयों में गीत अब भटके हुए हैं
अलगनी पर नैन की बस अश्रु ही अटके हुए हैं
" very touching composition, great expressions"

Regards

रंजना said...

शब्द की अँगनाईयों में गीत अब भटके हुए हैं
अलगनी पर नैन की बस अश्रु ही अटके हुए हैं
________

क्या कहूँ आपके शब्द और बिम्ब प्रयोग सदैव ही मुग्ध और चमत्कृत करते हैं.
अतिसुन्दर रस भाव से सराबोर अद्भुत कविता है,हमेशा की तरह.

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर.
धन्यवाद

सतीश सक्सेना said...

"और पग पत्थर बने, यह पायलों को श्रेय जाता
जो न पल भर थाम उनको नॄत्य में थी झनझनाई
अनलिखे हर गीत का दायित्व ढोती लेखनी ये
बाँझ होकर दे न पाई ज़िन्दगी कोई गज़ल को"

खेद अभिव्यक्ति की शानदार परिणिति है यह गीत ! अद्भुत लेखन शैली के लिए नमन स्वीकार करिए !

राकेश खंडेलवाल said...

आप सभी का हार्दिक धन्यवाद. आपने इस मामूली शब्द संयोजन को सराहा