Saturday, November 1, 2008

मुद्दतों पहले

मुद्दतों पहले जहां छोड़ लड़कपन आए
बारहा याद वे दालान, वे आँगन आए।

रास्ते में किसी बरगद का तो साया न मिला;
हाँ! मगर इसमें बबूलों के कई वन आए।

घर नगर छोड़ के जिस रोज़ से वनवास लिया
हमसे मिलने कई तुलसी, कई रावन आए।

रहे गुमनाम हर इक बज़्म ओ बाज़ार में हम
जैसे नाबीना शहर में कोई दरपन आए।

कट गई उम्र यूं ही आँख मिचौनी में नदीम
दुःख के बैसाख कभी दर्द के सावन आए।

8 comments:

sangita puri said...

अच्‍छा लगता है आपको पढना। इस प्रस्‍तुति के लिए धन्‍यवाद ।

फ़िरदौस ख़ान said...

मुद्दतों पहले जहां छोड़ लड़कपन आए
बारहा याद वे दालान, वे आँगन आए।

रास्ते में किसी बरगद का तो साया न मिला;
हाँ! मगर इसमें बबूलों के कई वन आए।


बेहद उम्दा...

seema gupta said...

रहे गुमनाम हर इक बज़्म ओ बाज़ार में हम
जैसे नाबीना शहर में कोई दरपन आए।

कट गई उम्र यूं ही आँख मिचौनी में नदीम
दुःख के बैसाख कभी दर्द के सावन आए। "

" kmaal kee bhavnatmk abheevykte hai"

Regards

Shiv said...

बहुत बढ़िया.

manvinder bhimber said...

रहे गुमनाम हर इक बज़्म ओ बाज़ार में हम
जैसे नाबीना शहर में कोई दरपन आए।

कट गई उम्र यूं ही आँख मिचौनी में नदीम
दुःख के बैसाख कभी दर्द के सावन आए।
बहुत बढ़िया.

Anonymous said...

सुंदर रचना। घर-गांव छोड़कर तो बबूल ही मिलते हैं।

राज भाटिय़ा said...

रास्ते में किसी बरगद का तो साया न मिला;
हाँ! मगर इसमें बबूलों के कई वन आए।
बहुत ही सुन्दर , लेकिन जो इन बबूल को भी फ़ुलो की तरह से मह्सुस करे वही एक दिन विजेता बनता है.
धन्यवाद

अमिताभ मीत said...

बहुत खूब. क्या बात है ..
रहे गुमनाम हर इक बज़्म ओ बाज़ार में हम
जैसे नाबीना शहर में कोई दरपन आए।
वाह !