Tuesday, November 4, 2008

खो गये चाँदनी रात में

चाँदनी रात के हमसफ़र खो गये चाँदनी रात में
बात करते हुए रह गये, क्या हुआ बात ही बात में

ज़िन्दगी भी तमाशाई है, हम रहे सोचते सिर्फ़ हम
देखती एक मेला रही, हाथ अपना दिये हाथ में

जिनक दावा था वो भूल कर भी न लौटेंगे इस राह पर
याद आई हमारी लगा आज फिर उनको बरसात में

जब सुबह के दिये बुझ गये, और दिन का सफ़र चुक गया
सांझ तन्हाईयां दे गई, उस लम्हे हमको सौगात में

तालिबे इल्म जो कह गये वो न आया समझ में हमें
अपनी तालीम का सिलसिला है बंधा सिर्फ़ जज़्बात में

आइने हैं शिकन दर शिकन, और टूटे मुजस्सम सभी
एक चेहरा सलामत मगर, आज तक अपने ख्यालात में

मेरे अशआर में है निहाँ जो उसे मैं भला क्या कहूँ
नींद में जाग में भी वही, है वही ज्ञात अज्ञात में

ये कलांमे सुखन का हुनर पास आके रुका ही नहीं
एक पाला हुआ है भरम, कुच हुनर है मेरे हाथ में

ख्वाहिशे-दाद तो है नहीं, दिल में हसरत मगर एक है
कर सकूँ मैं भी इरशाद कुछ एक दिन आपके साथ में

20 comments:

Anonymous said...

pahle kshama keejiye

Dr. Amar Jyoti said...

'मेरे अशआर में है निहां…"
बहुत ख़ूब!

सतीश सक्सेना said...

वाह वाह ! आपका नया अंदाज़ पसंद आया भाई जी !

नीरज गोस्वामी said...

आप की कोशिश बहुत अच्छी है, ग़ज़ल के भावः खूबसूरत हैं लेकिन लफ्जों में रवानी नहीं है इसलिए पढ़ते हुए खटकती है..कहीं कहीं शब्द लिखने में ग़लत लिखे गए हैं जैसे जिनका की जगह "जिनक" कुछ की जगह "कुच"..आदि...लिखते रहिये...ये छोटी मोटी गलतीयाँ अपने आप ठीक हो जाएँगी...
नीरज

डॉ.सुभाष भदौरिया. said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Rachna Singh said...

at least we can leave some people to write and express in peace . it seems subash ji feels that gazal writng is a branded affair subash brand , sameer brand , neeraj brand , so on so forth . i think comments which dont provied any strength to the original writng should be deleted . its all beominc too obnoxious now

Shar said...

हा ! हा! हा! गुरुजी, आज आप की महफिल में आये हैं तो क्या देखते हैं कि यहाँ तो आप की ही class लग रही है :)
ठीक भी है, आज की प्रस्तुति कुछ जमी नहीं:(
फिर आप के 'गीत कलश' पे देखा कि सात बजे तो आपने वहां एक बहुत ही सुन्दर कविता 'व्यक्ति बन कर आ प्रथम तू' परोसी है। तब समझ आया कि dinner तो वहाँ है, यहाँ तो 2 minute noodles हैं :)
कुछ दिन हुये हमने आप को अपनी एक गजल ठीक करने को कहा था तो आपने हँस के मना कर दिया था और पंकज सुबीर जी की class join करने की सलाह दी थी। हाँ, साथ में एक बहुत खूबसूरत शेर भी पढ दिया था। अब हमारी मंद बुद्धि को वह शेर पूरा याद नही है, नहीं तो यहाँ जरूर paste कर देते।
आशा करते है कल आप अपनी इस noodle में कुछ घुट्टि मिला के इसे भी रवां करेंगे :)
हाँ आपकी spelling mistakes से हमें भी बहुत शिकायत रहती है, जो हम समय-समय पे अपनी जान पे खतरा ले के जाहिर करते रहते हैं।
पर फिर सोचते हैं, Einstein अगर spelling mistakes की चिंता करता तो Theory of Relativity कौन लिखता !

jayaka said...

Gajhal to gajhal hi hoti hai aakhir!....ek naye andaaj ka swagat hai!

राज भाटिय़ा said...

चाँदनी रात के हमसफ़र खो गये चाँदनी रात में
बात करते हुए रह गये, क्या हुआ बात ही बात में
भाई हम तो वाह वाह करने वालो मै से है, अब गजल हो या ठुमरी, अच्छी लगी तो ठीक नही तो आगे निकल लिये.......

राकेश खंडेलवाल said...

मान्य श्री सुभाषजी
कॄपया यह बतायें कि आप किस बात की ओर इंगित कर रहे हैं> अपने ज्ञान की ओर, श्री नीरजजी के इस रचना को गज़ल की संज्ञा देने पर अथवा मेरे लिखने पर ? मैने तो इसे गज़ल कहा ही नहीं और न ही मैने कभी दावा किया कि मुझे गज़लें लिखना आता है. गज़ल के मामले में मैं श्री अमरजी, श्री घायल, शरद तैलंगजी, पंकज सुबीरजी और नीरज गोस्वामीजी के साथ प्राणजी तथा महावीर जी की रचनाओं को श्रेष्ठ मानता हूँ जो कि पढ़ने पर भावात्मकता को एक नया आयाम देती हैं.
वैसे एक बार और आपको स्पष्ट कर दूँ जिससे आप अच्छी तरह वाकिफ़ हैं, ( और आज से नहीं विगत लम्बे समय से )मैं गज़लें नहीं लिखता . हिन्दी में जिस रचना को गीतिका कहा जाता है वह न तो नज़्म होती है न ही गज़ल और उसकी सीमायें निर्धारित नहीं हैं.
वैसे मैने पहले ही कहा है
" काव्य का व्याकरण मैने जाना नहीं शब्द कागज़ पे खुद ही उतरते गये" अब आप इसमें क्या तलाशते हैं यह आप पर निर्भर है.

नीरजजी,

आपने सही कहा है मेरे टंकण में वर्तनी दोष काफ़ी होता है. व्यस्तता के कारण मैं सीधे कम्प्यूटर पर ही लिखता हूँ और बिना संपादन के ही भेज देता हूँ.
हाँ, आपसे शारजी से तथा अन्य सभी साथियों से एक बात कहना चाहता हूँ कि इस ब्लाग पर मेरी पुरानी रचनायें ही पोस्ट हो रही हैं. मेरी नई रचनायें गीतकलश पर ही लिखी जाती हैं. इस ब्लाग पर कुछ रचनायें लगभग चालीस वर्ष पुरानी भी हो सकती हैं. पुरानी रचनायें पोस्ट करने का ख्याल मुझे हिन्द-युग्म के सौजन्य से आया जहां उन्होंने इस बात की शुरुआत की थी.

सतीश सक्सेना said...

डॉ सुभाष भदौरिया का सबसे ख़राब कमेंट्स कह सकते हैं इसे !मुझे यह उम्मीद नही थी !

Shar said...

Samjhe Guruji :) :)

मेरे अशआर में है निहाँ जो उसे मैं भला क्या कहूँ
नींद में जाग में भी वही, है वही ज्ञात अज्ञात में

Udan Tashtari said...

जो भी हो, जैसा भी हो-हम तो राकेश भाई को सम्मोहित होकर सुनते हैं और हमें उनकी लेखनी हमेशा कुछ नई सीख देती है.

राकेश भाई की कलम की ऊँचाई, बिम्बों की ताकत और शब्द संचयन के आस पास भी हमें तो ब्लॉगजगत में कोई नजर नहीं आता और यह निश्चित ही अतिश्योक्ति नहीं है.

Dr. Amar Jyoti said...

साहित्यिक समीक्षा के भी कुछ मापदण्ड होते हैं और उनमें सर्वोपरि है अपनी भाषा का संयत, संयमित व अनुशासित होना। किसी भी रचना के उदात्त भाव पक्ष को पूरी तरह उपेक्षित करके शिल्प को लेकर रचनाकार
का मखौल उड़ाने का प्रयास और कुछ भी हो साहित्यिक तो नहीं ही कहा जा सकता। सुभाष जी की टिप्पणी ने बहुत,बहुत,बहुत ही निराश किया है। आशा और निवेदन है कि ऐसी टिप्पणियों की पु्नरावृत्ति नहीं होगी।

सतीश सक्सेना said...

सुभाष जी !
आपकी बहादुरी और बेवाकी का प्रसंशक रहा हूँ, मगर जब बेवाकी और बहादुरी दूसरों का अपमान का कारण बनने लगे तो उसे बहादुरी और बेवाकी नही कहा जाता ! जहाँ तक मेरी बात है मैं हिन्दी व्याकरण और लेखन शिल्प के बारे में कुछ भी नही जानता और न ही सीखना चाहता हूँ, मगर फिर भी मुझे कुछ लोग पढ़ते हैं, यही काफ़ी है ! मैं आज से आपके बारे में कुछ भी कहने से अपने आपको दूर ही रखना चाहूँगा !

makrand said...

ये कलांमे सुखन का हुनर पास आके रुका ही नहीं
एक पाला हुआ है भरम, कुच हुनर है मेरे हाथ में

well edited work sir

नीरज गोस्वामी said...

राकेश जी
ये भूल मुझसे हुई....मुझे ये नहीं मालूम था की ये उस राकेश जी का ब्लॉग है जिनकी रचनाओं के समक्ष मैं हमेशा नतमस्तक रहता हूँ...मैंने सोचा की ये कोई और राकेश है......इसलिए टिपण्णी की...अगर मुझे मालूम होता तब शायद मैं अपने शब्दों में परिवर्तन करता, मेरा मानना है की टिपण्णी में भाषा ऐसी होनी चाहिए जिससे बात बिना लेखक को आहत किए पहुँच जाए जिसे सुभाष जी "चिकनी चुपडी" की संघ्या दे रहे हैं.....और रही बात गुरु के नाम को डुबोने की तो ये उन्हें स्पष्ट कर दूँ की अगर मुझे कभी लगा की मेरे लेखन से गुरु के नाम पर आंच आ रही है तो उसी क्षण से लेखन बंद कर दूँगा...सुभाष जी की बात का मैं बुरा नहीं मानता...उनकी बात कहने की अदा अलग ही है. आप भी उनकी कही बात को भूल जायें.
नीरज

रचना said...

कुछ लोग आदत से मजबूर होते हैं . उनके लिये दूसरे पर टिका टिप्पणी करना केवल और केवल sadistic pleasure हैं . हमारे यहाँ कहते हैं " बरते को क्या बरतना " . जिन लोगो को हम लोग जानते हैं की उनके पास अपशब्दों की कमी नहीं हैं उनको बार बार तारीफ़ कर के झाड़ पर चढा दिया जाता हैं . राकेश जी के लिये अपशब्द न लिख कर इस बार उन्होने राकेश जी की रचना पर लिखा . कमेन्ट मोदेरेशन से भी ज्यादा जरुरी हैं की समय रहते खर पतवार को साफ़ किया जाए वरना नयी फसल को नष्ट होने मे देर नहीं होगी

@नीरज जी
मे आप की इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ "की उनकी बात कहने की अदा अलग ही है. आप भी उनकी कही बात को भूल जायें. "
अदा कह कर वो ग़लत प्रक्रिया को सही बता रहे हैं .
और अपशब्दों को मासूमियत मे की गयी गलती बता रहे हैं . कोई निरंतर एक ही प्रकार की बात करे तो उसका पुरजोर विरोध ही करना होगा और खुल कर करना होगा . बिना डरे

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" said...

CHALO THEEK HAI
ACHCHHEE BAATON KO VYAKARAN MEN BAANDHANE N BAANDHANE KE CHAKKAR KO TYAAG KAR EK SOUHAARD POORN CHARCHAA HO TO ACHCHHEE BAAT HAI.
SAAFGOI MEN SAADAGEE HONA ZAROOREE HAI

Parul said...

bahut sundar!