Friday, November 7, 2008

चिड़िया के बच्चे

चिड़िया के बच्चों ने पर तौले ;
और उड़ चले।
नन्हें-नन्हें फड़फड़ाते पर
कोमल और सुकुमार.

कुछ तेज़ी से उड़े;
आगे निकले;और बनाया
एक नया नीड़;
फिर से लिखने को-
वही पुरातन चिर कथा.

कुछ के पंख
इतने सशक्त न थे.
आंधी-वर्षा से जूझते
वे जा गिरे धरती पर-
और ग्रास बने –
व्यालों बिलावों के.

कुछ करते रहे जतन ,
नीड़ के निर्माण का.
रहे खोजते कोई सशक्त डाल
छाया और आश्रय को.
कुछ को मिली;
कुछ को नहीं मिली.

सबका था अपना-अपना
जीवन-समर;
अपने-अपने नीड़,
अपनी-अपनी डाल;
अपने-अपने व्याल.

पर एक तथ्य
उन सबकी गाथा में साझा था.
उनमें से कोई भी
पुराने नीड़ पर नहीं लौटा.

7 comments:

सतीश सक्सेना said...

क्या लिख दिया दोस्त ! बहुत कष्टदायक है, हालाँकि जीवन की कठोर वास्तविकता बयान की आपने, अपने नए अंदाज़ में, डॉ अमर ज्योति !
हम लोगों के हाथ क्या आता है ? शायद बुढापे में सबसे अधिक प्यारों की आवश्यकता होती है, और वे ही हमारे पास नही होते ! यही जीवन है ???
मगर इस रचना में भी तीखापन वही है .... आपका पुराना अंदाज़ ! सादर नमन !

नीरज गोस्वामी said...

बहुत अच्छे शब्दों में जीवन व्यथा बयां की है आपने...वाह.
नीरज

राकेश खंडेलवाल said...

अमरजी,

सत्य को नये अन्दाज़ में प्रस्तुत किया आपने. सुन्दर

Shar said...

जब भी आपका लिखा पढते हैं, जीवन का कोई दर्शन दर्पन में दिख जाता है !
बहुत गहरा लिखते हैं। आपकी कलम और सोच की रवानगी यूँ ही बनी रहे ! कुछ बचपन की मनपसंद कवितायें याद आ गयी। भाव तो अलग हैं, लेकिन फिर भी --
"नीड का निर्माण फिर फिर
नेह का आव्हान फिर फिर"
--------------
"ओ पीपल के पीले पत्ते"
---------------
सादर ।।

P.S. अज्ञेय जी को पढते हैं आप ?

Dr. Amar Jyoti said...

आप सभी का हार्दिक आभार। shar'जी! अज्ञेय को बहुत पहले पढ़ा था कॉलेज के ज़माने में। एक अकेले तिनके वाले हारिल वाली उनकी कविता बहुत अच्छी लगती थी(अब भी लगती है पर अब याद नहीं है)।
आपके ब्लॉग पर कैसे पहुंचा जाय कृपया बतायें।

Shar said...

अमर जी,
मेरा कोई ब्लाग नहीं है।
हाँ, आपके Random Rumblings पे सुमित्रानंदन जी की पंक्तियां भी मैंने लिखीं थी, गलती से comment anonymous रह गया!

Saadar . . . Shar
--------------
अज्ञेय जी की आपकी पसंदीदा कविता, प्रस्तुत है आपके लिये :

उड़ चल हारिल
-----------
उड़ चल, हारिल, लिये हाथ में
यही अकेला ओछा तिनका।
उषा जाग उठी प्राची में -
कैसी बाट, भरोसा किन का!

शक्ति रहे तेरे हाथों में -
छूट न जाय यह चाह सृजन की,
शक्ति रहे तेरे हाथों में -
स्र्क न जाय यह गति जीवन की!

ऊपर-ऊपर-ऊपर-ऊपर
बढ़ा चीर चल दिग्मंडल
अनथक पंखों की चोटों से
नभ में एक मचा दे हलचल!

तिनका? तेरे हाथों में है
अमर एक रचना का साधन-
तिनका? तेरे पंजे में है
विधना के प्राणों का स्पंदन!

काँप न यद्यपि दसों दिशा में
तुझे शून्य नभ घेर रहा है,
स्र्क न यदपि उपहास जगत का
तुझको पथ से हेर रहा है

तू मिट्टी था, किन्तु आज
मिट्टी को तूने बाँध लिया है
तू था सृष्टि किन्तु सृष्टा का
गुर तूने पहचान लिया है !

मिट्टी निश्चय है यथार्थ, पर
क्या जीवन केवल मिट्टी है?
तू मिट्टी, पर मिट्टी से
उठने की इच्छा किसने दी है?

आज उसी ऊर्ध्वंग ज्वाल का
तू है दुर्निवार हरकारा
दृढ़ ध्वज दण्ड बना यह तिनका
सूने पथ का एक सहारा!

मिट्टी से जो छीन लिया है
वह तज देना धर्म नहीं है,
जीवन साधन की अवहेला
कर्मवीर का कर्म नहीं है!

तिनका पथ की धूल स्वयं तू
है अनंत की पावन धूली-
किन्तु आज तूने नभ पथ में
क्षण में बद्ध अमरता छू ली!

उषा जाग उठी प्राची में -
आवाहन यह नूतन दिन का
उड़ चल हरियल लिये हाथ में
एक अकेला पावन तिनका!

--अज्ञेय

अनुपम अग्रवाल said...

पर एक तथ्य
उन सबकी गाथा में साझा था.
उनमें से कोई भी
पुराने नीड़ पर नहीं लौटा.

behtareen