Tuesday, November 11, 2008

अतीत के झरोखों से

कौन झंकारता तार मन के मेरे
उंगलियाँ सारी मुझको मिलीं व्यस्त ही

किस तरह गीत अपना सुनाऊँ तुम्हें
मन की वीणा के तारों में कम्पन नहीं
खुश्बूओं में डुबो शब्द बिखराये तो
किन्तु महका कहीं कोइं चन्दन नहीं
मैने कितना अलंकॄत किया शब्द को
किन्तु मिल न सका अर्थ कोइं उन्हें
हो गया व्यर्थ श्रॄंगार सारा प्रिये
छू न पाया मेरा प्रस्फुटित स्वर तुम्हें

ताकता मैं रहा नित्य प्राची मगर
सूर्य उगने से पहले हुआ अस्त ही

अर्थ को खोजते शब्द खुद खो गया
जो था शाश्वत कभी,आज नश्वर हुआ
भावनायें मेरी खटखटाती रहीं द्वार
पर हर ह्रदय आज पत्थर हुआ
देखते देखते मेरी सम्प्रेषणा
लड़ती अवरोध से छिन्न हो रह गयी
जो भी संचित थी पूँजी मेरी साँस की
आह की आँधियों में सिमट बह गयी

रोज पलकों पे अपनी सजाता रहा,
पर महल स्वप्न का हर मिला ध्वस्त ही

स्वर सभी गूँजते शंख के खो गये
आरती मन्दिरों से परे रह गयी
रास्ता भूल कर खो गइं है घटा
बात ये इक हवा पतझरी कह गइं
साँझ के दीप में शेष बाती नहीं
रोशनी क्षीण हो टिमटिमाती रही
जो न निकली किसी साज के तार से
एक आवाज़ सी सिर्फ़ आती रही

गणना तारों नक्षत्रों की जब भी करी
हर सितारा मिला राहू श्ंर ग्रस्त ही

कौन झन्कारता तार मन के मेरे
उंगलियाँ सारी मुझको मिलीं व्यस्त ही

6 comments:

Shar said...

:(

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब, हमेशा की तरह !

Dr. Amar Jyoti said...

बिखरते दिशाहीन निर्मम समाज में नैसर्गिक सुकुमार भावनाओं की निष्ठुर उपेक्षा का अद्भुत शब्दचित्र। बधाई।

Udan Tashtari said...

वाह!! राकेश भाई-अद्भुत!! आनन्द आ गया.

Shar said...

मन के तारों में झनकार खुद आयेगी
जो हवा पतझडी, राग बन जायेगी
तू जलाते ही रहना दिये गीत के
तेरे कदमों में दुनिया सिमट आयेगी !

रंजना said...

adbhud......
peeda shabd odh sajeev hokar prakat ho gayi.