Tuesday, November 18, 2008

कुछ यहाँ पर हो गया है

है नहीं बदलाव कोई, सूरतें वे ही पुरानी
पर न जाने लग रहा क्यों कुछ यहाँ पर हो गया है

चाँदनी वाले क्षितिज से
देखिये नजरें फिराकर
प्रीति के इतिहास की
गौरव कथायें गुनगुनाकर
यामिनी-गंधा सुमन की
गंध में डूबी हुई सी
एक दुल्हन सी, प्रतीक्षा
में खड़ी देखें प्रतीची

रक्तवर्णी चूनरी से झील का श्रन्गार कर के
देखिये सूरज अचानक आज फिर से खो गया है

पनघटों पर गागरों की
पंक्तियाँ अनगिन बनाकर
खेत की हर मेंड़ पर
आषाढ़ की मल्हार गाकर
चातकों की प्यास के हर
सुप्त पल को सींचता सा
धुंध में डूबे गगन में
एक रेखा खींचता सा

डाल भ्रम में सावनों के गांव का हर इक मुसाफ़िर
एक बादल का कोई टुकड़ा यहाँ फिर रो गया है

6 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

'पनघटों पर गागरों की…'
अनूठा!, अद्भुत!
पुरानी यादें ताज़ा हो गईं।
'चाहे जितना रस ढुलकाया हो पनघट ने
मरघट तक आकर सबकी गागर रीत गई।'
हार्दिक बधाई।

Anil Pusadkar said...

बढिया।

Shar said...

कविशिरोमणि,

गाँव भर को दे कर तृप्ति, बादल धर्म निभा जाता है
उल्लेख ना इसका करता है पर, प्यासा खुद वो रह जाता है!
सत्य और गल्प में कविवर, मैं बस ये अंतर पाता हूँ
सत्य जहाँ मर्यादित चुप हो, गल्प कहानी कह जाता है ।
========
अमर जी की बात को समर्पित:

कभी शून्य में भी आ कर के, जीवन के हल मिल जाते हैं
हाथ नहीं जब कुछ भी रहता, ह्रदय बहुत ही खुल जाते हैं !

सादर ।।

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर.
धन्यवाद

Parul said...

expressive words

अनुपम अग्रवाल said...

रक्तवर्णी चूनरी से झील का श्रन्गार कर के
देखिये सूरज अचानक आज फिर से खो गया है

अद्भुत अभिव्यक्ति