Friday, November 21, 2008

कह गया था

कह गया था, मगर नहीं आया;
वो कभी लौट कर नहीं आया।

क़ाफिले में तमाम लोग थे पर,
बस वही हमसफ़र नहीं आया।

रेल जीवन की ‘टर्मिनस’ पहुंची;
किंतु मेरा शहर नहीं आया।

ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो,
आ तो सकता था, पर नहीं आया।

एक मेरी बिसात क्या, सुख तो
जाने कितनों के घर नहीं आया।

10 comments:

seema gupta said...

एक मेरी बिसात क्या, सुख तो
जाने कितनों के घर नहीं आया।
'jane kitne dilon kee dharkan or byan kertee hain ye lines....shabdon ne bhavon mey jaan daal dee hai.."

Regards

शोभा said...

ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो,
आ तो सकता था, पर नहीं आया।

एक मेरी बिसात क्या, सुख तो
जाने कितनों के घर नहीं आया।
वाह!बहुत बढ़िया लिखा है।

विवेक सिंह said...

nice work .

"अर्श" said...

BAHOT HI UMDA LEKHAN HAI BAHOT KHUB ..DHERO SADHUWAD AAPKO SAHAB...

REGARDS
ARSH

Shar said...

"रेल जीवन की ‘टर्मिनस’ पहुंची;
किंतु मेरा शहर नहीं आया।"
====
"सुख तो जाने कितनों के घर नहीं आया "

बहुत खूब !

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब !

Akshaya-mann said...

क्या बात कह दी वाह!!
एक मेरी बिसात क्या, सुख तो
जाने कितनों के घर नहीं आया।
सही बात है सही बात है बहुत उम्दा सच्चाई है...
हम कहाँ हैं अभी सुख की नज़र में अभी तो दुखो की
नज़र लगी है हमारी बदलती किस्मत पर

मन को बहुत अच्छा लगा इस ब्लॉग पर आकर .....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है आने के लिए
आप
๑۩۞۩๑वन्दना
शब्दों की๑۩۞۩๑
इस पर क्लिक कीजिए
आभार...अक्षय-मन

अनुपम अग्रवाल said...

मैंने कहीं सुना था ;
वो वायदा कर गए थे मिलने का पाँचवे दिन का
किसी से सुन लिया होगा कि दुनिया चार दिन की है..

राकेश खंडेलवाल said...

रेल जीवन की ‘टर्मिनस’ पहुंची;
किंतु मेरा शहर नहीं आया।

अमरजी
इसके बाद कुछ शेष नहीं कहने को.

सादर

राकेश

shyam kori 'uday' said...

ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो,
आ तो सकता था, पर नहीं आया।
...दिल की संवेदना, जो कभी आस नही छोडती।

एक मेरी बिसात क्या, सुख तो
जाने कितनों के घर नहीं आया।
... शानदार-जानदार अभिव्यक्ति है।