Tuesday, November 25, 2008

यादों के दीपक जलते हैं

बिम्ब उलझ कर जब संध्या में, सूरज के संग संग ढलते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

सिरहाने के तकिये में जब ओस कमल की खो जाती है
राह भटक कर कोई बदली, बिस्तर की छत पर छाती है
लोरी के सुर खिडकी की चौखट के बाहर अटके रहते
और रात की ज़ुल्फ़ें काली रह रह कर बिखरा जाती हैं


तब सपने आवारा होकर अम्बर में उडते रहते है
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं


पनघट की सूनी देहरी पर जब न उतरती गागर कोई

राह ढूँढती इक पगडन्डी रह जाती है पथ में खोई
सुधियों की अमराई में जब कोई बौर नहीं आ पाती
बरगद की फ़ुनगी पर बैठी बुलबुल गीत नहीं जब गाती


और हथेली में किस्मत के लेखे जब बनते मिटते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

इतिहासों के पन्नों में से चित्र निकल जब कोई आता
रिश्तों की कोरी चूनर से जुड जाता है कोई नाता
पुरबाई जब सावन को ले भुजपाशों में गीत सुनाये
रजनीगन्धा की खुशबू जब दबे पाँव कमरे तक आये

और क्षितिज पर घिरे कुहासे में जब इन्द्रधनुष दिखते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं


(२००३)

11 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

संवेदनशील मन की सर्जनात्मकता की प्रष्ठभूमि का
यथार्थपरक चित्रण। बहुत बहुत बधाई।

Shar said...

:)

seema gupta said...

सिरहाने के तकिये में जब ओस कमल की खो जाती है
राह भटक कर कोई बदली, बिस्तर की छत पर छाती है
लोरी के सुर खिडकी की चौखट के बाहर अटके रहते
और रात की ज़ुल्फ़ें काली रह रह कर बिखरा जाती हैं

तब सपने आवारा होकर अम्बर में उडते रहते है
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं
"very touching and emotional creation..."

Regards

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर ।

mehek said...

har lafz ek chitra aur ehsaas bankar samne ata hai,bahut hi khubsurat rachana badhai

Udan Tashtari said...

अति सुन्दर!!! वाह!

परमजीत बाली said...

बहुत ही सुन्दर रचना है\बधाई।

इतिहासों के पन्नों में से चित्र निकल जब कोई आता
रिश्तों की कोरी चूनर से जुड जाता है कोई नाता
पुरबाई जब सावन को ले भुजपाशों में गीत सुनाये
रजनीगन्धा की खुशबू जब दबे पाँव कमरे तक आये

और क्षितिज पर घिरे कुहासे में जब इन्द्रधनुष दिखते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

सतीश सक्सेना said...

"सिरहाने के तकिये में जब ओस कमल की खो जाती है
राह भटक कर कोई बदली, बिस्तर की छत पर छाती है....

क्या अभिव्यक्ति है राकेश भाई ! हर लाइन को बार बार पढने का दिल करता है ! नमन आपकी सृजनशीलता को !

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर कविता के लिये धन्यवाद

राकेश खंडेलवाल said...

आप सभी का आभार.

dr.bhoopendra singh said...

bahut umda likhte hai aap.Itni acchi kvitayen, suchmuch anand aagaya
likhte rahiye .
sadar
dr.bhoopendra