Friday, November 28, 2008

वो मेरे बच्चों को

वो मेरे बच्चों को स्कूल ले के जाता था।
और उसका बेटा वहीं खोमचा लगाता था॥

उन्हें जो धूप से, बरसात से बचाता था ।
खुद उसके सर पे फ़क़त आसमाँ का छाता था।

भटक गया हूं जहां मैं –कभी उसी वन से,
सुना तो है कि कोई रास्ता भी जाता था॥

सियाह रात थी, और आँधियाँ भी थीं; लेकिन
उन्हीं हवाओं में एक दीप टिमटिमाता था ॥

उसे पड़ोसी बहुत नापसन्द करते थे।
वो रात में भी उजालों के गीत गाता था॥

5 comments:

"अर्श" said...

उसे पड़ोसी बहुत नापसन्द करते थे।
वो रात में भी उजालों के गीत गाता था॥

bahot hi badhiya likha hai aapne dhero badhai aapko....

नीरज गोस्वामी said...

सियाह रात थी, और आँधियाँ भी थीं; लेकिन
उन्हीं हवाओं में एक दीप टिमटिमाता था ॥
उसे पड़ोसी बहुत नापसन्द करते थे।
वो रात में भी उजालों के गीत गाता था॥
अमर जी आप का पहला शेर आज के हालत पर बहुत कुछ कह जाता है...इस दहशत गर्दी के दौर में सिर्फ़ उम्मीद का दीप की टिमटिमा कर हमें हौसला दे रहा है...और आप का मकता...सुभानाल्लाह....वाह.
नीरज

Shar said...

उसे पड़ोसी बहुत नापसन्द करते थे।
वो रात में भी उजालों के गीत गाता था॥

yeh sher accha laga!

sadar

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर लगे आप के यह शेर
धन्यवाद

सतीश सक्सेना said...

बहुत अच्छे भाई जी !