Tuesday, December 2, 2008

अतीत के झरोखों से

मौन है स्वर, ह्रदय गूँगा, आँख में आँसू नहीं हैं
इक अपाहिज सी व्यथा का बोझ कांधे पे रखा है

ढाक के वे तीन पत्ते, जो सदा शाश्वत रहे हैं
आज फिर से सामने आये हैं मेरे खिलखिलाते
नीम की कच्ची निबोली पर मुलम्मा चाशनी का
उम्र सारी ये कटी है बस यूँही धोखे उठाते

तोड जी करते प्रयासों का, सदा उपलब्धियों के
हश्र क्या होगा किसी को ग्यात ये कब जो सका है

साँझ ढूंढे मोरपंखी बिम्ब दर्पण में निशा के
साथ चलना चाहती द्रुतगामिनी चलती हवा के
पर टिकी बैसाखियों पर एक जर्जत क्षीण काया
दो कदम भी बढ न पाती,ठोकरें खा लड्खडा के

भोर का पाथेय लेकर राह कोई सज न पाती
नीड में ही हर मुसाफ़िर हार कर बैठा थका है

5 comments:

Shardula said...

गुरुजी,
एक आपकी ही लिखी प्रार्थना के अंश लिख रही हूँ नीचे । कोई विशेष कारण नहीं है, यूँ ही याद आ गई ।
सादर--शार्दुला
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"करुणा सूर्य तुम्हारा जब से चमका मेरी अँगनाई में
हर झंझा का झौंका, आते ढल जाता है पुरबाई में
नागफ़नी के काँटे हो जाते गुलाब की पंखुरियों से
गीत सुनाती है बहार, हर उगते दिन की अँगड़ाई में

एक तुम्हारा दृष्टि परस ही जीवन को जीवन देता है
केवल माली की कोशिश से कोई कली नहीं खिल पाती

तेरी रजत आभ में घुल कर सब स्वर्णिम होता जाता है
मन पागल मयूर सा नर्तित, पल भी बैठ नहीं पाता है
तू कवि तू स्वर, भाषा, अक्षर, चिति में चिति भी तू ही केवल
तेरे बिन इस अचराचर में अर्थ नहीं कोई पाता है

तेरे वरद हस्त की छाया, सदा शीश पर रहे हमारे
और चेतना इसके आगे कोई प्रार्थना न कर पाती "

नारदमुनि said...

thak kar baithane mat do musafir ko, jeevan chalane ka nam. narayan narayan

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर
धन्यवाद

आलोक शंकर said...

aap se bahut seekhna hai sir

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब राकेश भाई !