Friday, December 12, 2008

जब भी चाहा

जब भी चाहा तुमसे थोड़ी प्यार की बातें करूं

पास बैठूं दो घड़ी,श्रृंगार की बातें करूं।



वेदना चिरसंगिनी हठपूर्वक कहने लगी

आंसुओं की,आंसुओं की धार की बातें करूं।



देखता हूँ रुख ज़माने का तो ये कहता है मन

भूल कर आदर्श को व्यवहार की बातें करूं।



आप कहते हैं प्रगति के गीत गाओ गीतकार;

सत्य कहता है दुखी संसार की बातें करूं।



चाटुकारों के नगर में सत्य पर प्रतिबन्ध है।

किस लिए अभिव्यक्ति के अधिकार की बातें करूं।



इस किनारे प्यास है; और उस किनारे है जलन

क्यों न फिर तूफ़ान की मंझधार की बातें करूं.

9 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत ही बेहतरीन गज़ल है।
लाजवाब!

चाटुकारों के नगर में सत्य पर प्रतिबन्ध है।
किस लिए अभिव्यक्ति के अधिकार की बातें करूं।

इस किनारे प्यास है; और उस किनारे है जलन
क्यों न फिर तूफ़ान की मंझधार की बातें करूं.

Vijay Kumar Sappatti said...

dear sir

i came first time to your blog and read the posts , this one is very impressive . and I enjoyed the poem

इस किनारे प्यास है; और उस किनारे है जलन क्यों न फिर तूफ़ान की मंझधार की बातें करूं.

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Vijay

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत सुंदर...हिन्दी में गजल लिखना शायद आसान नहीं लेकिन आपने जितनी खूबसूरत गजल लिखी है, उसके लिए आपको बधाई.

राकेश खंडेलवाल said...

चाटुकारों के नगर में सत्य पर प्रतिबन्ध है।
किस लिए अभिव्यक्ति के अधिकार की बातें करूं।

अमरजी.

अभिव्यक्ति के अधिकार की अभिव्यक्ति सुन्दर लगी. सादर नमन.

राज भाटिय़ा said...

बहुत खुब.बहुत सुंदर, बहुत ही सुंदर भाव .... चाटूकारो के नगर मै....
धन्यवाद

Manoshi said...

nice...

सतीश सक्सेना said...

बहुत सुंदर कृति ! शुभकामनायें !

नीरज गोस्वामी said...

वेदना चिरसंगिनी हठपूर्वक कहने लगी
आंसुओं की,आंसुओं की धार की बातें करूं।
देखता हूँ रुख ज़माने का तो ये कहता है मन
भूल कर आदर्श को व्यवहार की बातें करूं।
चाटुकारों के नगर में सत्य पर प्रतिबन्ध है।
किस लिए अभिव्यक्ति के अधिकार की बातें करूं।
वाह अमर जी वाह...शब्द और भाव का बेहतरीन संगम दिखाई दिया आप की इस रचना में...बेमिसाल...कितनी कुशलता से आप ने हिन्दी के शब्दों को पिरोया है...देख कर मन प्रसन्न हो गया...मेरी बधाई....
नीरज

Shardula said...

अमर जी,
बहुत अच्छे लगे ये शेर !

देखता हूँ रुख ज़माने का तो ये कहता है मन
भूल कर आदर्श को व्यवहार की बातें करूं।
चाटुकारों के नगर में सत्य पर प्रतिबन्ध है।
किस लिए अभिव्यक्ति के अधिकार की बातें करूं।