Wednesday, December 17, 2008

चित्र मावस का था, रंग भरते रहे

राहें ठोकर लगाती रहीं हर घड़ी
और हम हर कदम पर संभलते रहे
कट रही ज़िन्दगी लड़खड़ाते हुए
स्वप्न बनते संवरते बिगड़ते रहे

चाह अपनी हर इक टंग गई ताक पर
मन में वीरानगी मुस्कुराती रही
आस जो भी उगी भोर आकाश में
साँझ के साथ मातम मनाती रही
अधखुले हाथ कुछ भी पकड़ न सके
वक्त मुट्ठी से पल पल खिसकता रहा
शब्द के तार से जुड़ न पाया कभी
स्वर अधूरा गले में सिसकता रहा

कोई भी न मिला मौन जो सुन सके
सुर सभी होठ पर आ बिखरते रहे

जेठ गठजोड़ मधुबन के संग कर रहा
कोंपलें सब उमीदों की मुरझा गईं
टूट कर डाल से उड़ गये पात सी
आस्थायें हवाओं में छितरा गईं
देह चन्दन हुई, सर्प लिपटे रहे
मन के मरुथल में उगती रही प्यास भी
कल्पनाओं के सूने क्षितिज पर टंगा
पास आया न पल भर को मधुमास भी

हाथ में तूलिका बस लिये एक हम
चित्र मावस का था, रंग भरते रहे

भोर को पी गई इक किरण सूर्य की
साँझ दीपक बनी धार में बह गई
टिमटिमाते सितारों की परछाईयाँ
रात की ओढ़नी पर टँकी रह गईं
प्यास हिरना के बनकर भटकते सपन
नींद सो न सकी एक पल के लिये
अर्थ पाने की हम कोशिशें कर रहे
जो बुजुर्गों ने आशीष हमको दिये

मान्यताओं के घाटों पे काई जमी
हम कदम दर कदम बस फिसलते रहे

5 comments:

नारदमुनि said...

zindgi bhee kuchh aisi hee hai, aap jaise chaho rang bhar sakte ho. narayan narayan

Dr. Amar Jyoti said...

अवसाद की सँक्रामक अभिव्यक्ति।

seema gupta said...

प्यास हिरना के बनकर भटकते सपन
नींद सो न सकी एक पल के लिये
अर्थ पाने की हम कोशिशें कर रहे
जो बुजुर्गों ने आशीष हमको दिये
""निशब्द हूँ.."
regards

Shardula said...

गुरुजी,
वाह क्या range है आप के कलम की, जो लिखते हैं last word सा लगता है। मन होता है हर गीत के बाद लिख दें 'period', जो कहना था कहा जा चुका ! आज गीत कलश पे उल्लास, यहाँ अवसाद !दोनों की अद्भुत अभिव्यक्ति !!
कहाँ हैं आपके चरण ??
सादर ।।

राज भाटिय़ा said...

राहें ठोकर लगाती रहीं हर घड़ी
और हम हर कदम पर संभलते रहे
कट रही ज़िन्दगी लड़खड़ाते हुए
स्वप्न बनते संवरते बिगड़ते रहे
वाह वाह लगता है आप हमारी ही जिन्दगी मै झांक कर यह कविता लिख गये....
बहुत बहुत धन्यवाद