Friday, December 19, 2008

दूर का मसला

दूर का मसला घरों तक आ रहा है
बाढ़ का पानी सरों तक आ रहा है।

आग माना दूर है, लेकिन धुआं तो,
इन सुहाने मंज़रों तक आ रहा है।

लद चुके दिन चूड़ियों के,मेंहदियों के;
फावड़ा कोमल करों तक आ रहा है।

मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस का
जीविका के अवसरों तक आ रहा है।

इसने कुछ इतिहास से सीखा नहीं है;
एक प्यासा सागरों तक आ रहा है।

9 comments:

परमजीत बाली said...

bahut sundar ur saamyik rachanaa hai|badhaai|

मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस का
जीविका के अवसरों तक आ रहा है।

रंजना said...

Waah ! Bahut sarthak aur sundar baat sundar dhang se kahi aapne.Bahut hi sundar rachna ke liye aabhar.

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

आग माना दूर है, लेकिन धुआं तो,
इन सुहाने मंज़रों तक आ रहा है।

बिंदास अभिव्यक्ति. शुभकामनाओ के साथ

कविता वाचक्नवी said...

बढ़िया लगीं-

लद चुके दिन चूड़ियों के,मेंहदियों के;
फावड़ा कोमल करों तक आ रहा है।

नीरज गोस्वामी said...

मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस का
जीविका के अवसरों तक आ रहा है।
बहुत खूब...बेहतरीन ग़ज़ल...
नीरज

sandhyagupta said...

मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस का
जीविका के अवसरों तक आ रहा है।

sundar.

Dr. Amar Jyoti said...

आप सभी का हार्दिक आभार।

सतीश सक्सेना said...

गज़ब का मसला उठाया है भाई जी !

"अर्श" said...

वर्तमान परिस्थिति को बेहतर ढंग से लिखा है आपने बहोत खूब .....


अर्श