Tuesday, December 30, 2008

आपकी राह उन मोतियों से सजे

फिर नया वर्ष आकर खड़ा द्वार पर,
फिर अपेक्षित है शुभकामना मैं करूँ
मांग कर ईश से रंग आशीष के
आपके पंथ की अल्पना मे भरूँ
फिर दिवास्वप्न के फूल गुलदान में
भर रखूँ, आपकी भोर की मेज पर
न हो बाती, नहीं हो भले तेल भी,
कक्ष में दीप पर आपके मैं धरूँ

फिर ये आशा करूँ जो है विधि का लिखा
एक शुभकामना से बदलने लगे
खंडहरों सी पड़ी जो हुई ज़िन्दगी
ताजमहली इमारत में ढलने लगे
तार से वस्त्र के जो बिखरते हुए
तागे हैं, एक क्रम में बंधें वे सभी
झाड़ियों में करीलों की अटका दिवस
मोरपंखी बने और महकने लगे

गर ये संभव है तो मै हरइक कामना
जो किताबों में मिलती, पुन: कर रहा
कल्पना के क्षितिज पर उमड़ती हुई
रोशनी मे नया रंग हूँ भर रहा
आपको ज़िन्दगी का अभीप्शित मिले
आपने जिसका देखा कभी स्वप्न हो
आपकी राह उन मोतियों से सजे
भोर की दूब पर जो गगन धर रहा.

8 comments:

Unknown said...

बहुत ही सुंदर लिखा है...आपको भी नव वर्ष की शुभकामनाये

Dr. Amar Jyoti said...

'नये वर्ष का इससे सुन्दर उपहार और क्या होगा? हार्दिक आभार और शुभकामनायें।

निर्मला कपिला said...

नव वर्ष के इस अनुपम उपहार के लिये ध्न्यबाद आपकी राह भी उन मोतियों से सजे

Anonymous said...

bahut khubsuratkavita,happy new year

Satish Saxena said...

बहुत सुंदर आशा की किरण !बेहद खूबसूरत गीत !

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना, धन्यवाद

Anonymous said...

नववर्ष की आप सभी को बहुत-बहुत बधाई। ये पंक्तियां मेरी नहीं हैं लेकिन मुझे काफी अच्‍छी लगती हैं।
नया वर्ष जीवन, संघर्ष और सृजन के नाम

नया वर्ष नयी यात्रा के लिए उठे पहले कदम के नाम, सृजन की नयी परियोजनाओं के नाम, बीजों और अंकुरों के नाम, कोंपलों और फुनगियों के नाम
उड़ने को आतुर शिशु पंखों के नाम

नया वर्ष तूफानों का आह्वान करते नौजवान दिलों के नाम जो भूले नहीं हैं प्‍यार करना उनके नाम जो भूले नहीं हैं सपने देखना,
संकल्‍पों के नाम जीवन, संघर्ष और सृजन के नाम!!!

Shardula said...

अति सुन्दर ! अति सुन्दर !
अद्भुत रचना !
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ये बात सुन लें परम ओ सखा
स्नेह हमको मिला आपसे यों सदा
पहले ही जिन्दगी इतनी खुशहाल थी
आपके साथ ने और रोशन किया !

तो नहीं हमने फिर ये पढीं पंक्तियाँ
ज़िन्दगी खंडहरों, तार से वस्त्र की
क्योंकि आशीषें ले के सुखी हम सदा
हमने हर हाल में ढूँढ ली एक खुशी !

तीसरे छ्न्द में जो कहा आपने
और दिया आज फिर से ये मोती भरा
हमने गठरी में अपनी संभाला उन्हें
उन सौगातों को सिर-आँखों पे है धरा !

सादर ।।