Friday, January 30, 2009

दुम हिलाना

दुम हिलाना
कोई मुहावरा नहीं है।
न ही मजबूरी;
कृतज्ञता?
हरगिज़ नहीं!
वह है -

एक मानसिकता
जो कुत्ते के दांतों पर हावी है।

Tuesday, January 27, 2009

मेरे अधरों पर हस्ताक्षर

मेरे अधरों पर हस्ताक्षर

प्रिये अधर से तुमने अपने जब से किये अधर पर मेरे
हस्ताक्षर, तब से सपनों की बगिया और निखर आई है

आतुर हुई कामना भर ले यष्टि कमल को भुजपाशों में
आकाँक्षायें हैं सांसों की घुलें महक वाली सांसों में
नयनों की पुतली बन रांझा,चित्र हीर के बना रही है
नये रंग में नये रूप के मिले न जैसे इतिहासों में

देह तुम्हारी छूकर आई पुरबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है

लगी जागने भोर रूप की उजली धूप बाँह में लेकर
निशा संवरने लगी घटाओं से लहराते कुन्तल छूकर
नींदों वाली डोर थाम कर लगे झूलने झूला तारे
महकीं डगर, और अलगोजे लगे गूँजने चहुंदिशि भू पर

द्वार तुम्हारे से आ मलयज मेरी गलियों से जब गुजरी
मुझको लगा तुम्हारे नूतन संदेसे लेकर आई है

हुए तिरोहित एक निमिष में मन के मेरे संशय सारे
रातों में आ लगे जलाने दीपक पूनम के उजियारे
नदिया की लहरों सी पल पल लगीं उमड़ने मधुर उमंगें
एक तुम्हारी छवि रहती है बस नजरों में सांझ सकारे

स्वर से उपजी सरगम ने आ जब से छुआ गीत इक मेरा
लगा मुझे मेरे शब्दों में वीणा स्वयं उतर आई है

Friday, January 9, 2009

टूटे यूं संबंध सत्य से

टूटे यूं संबंध सत्य से सभी झूठ स्वीकार हो गये।
ठोकर खाते-खाते आख़िर हम भी दुनियादार हो गये॥

बचपन से सुनते आये थे
सच को आंच नहीं आती है।
पर अब देखा-सच बोलें तो,
दुनिया दुश्मन हो जाती है॥

सत्यम वद, धर्मम चर के उपदेश सभी बेकार हो गये।
ठोकर खाते-खाते………….

खण्डित हुई सभी प्रतिमाएं;
अब तक जिन्हें पूजते आए।
जिस हमाम में सब नंगे हों,
कौन भला किससे शरमाए?

बेचा सिर्फ़ ज़मीर और सुख-स्वप्न सभी साकार हो गये।
ठोकर खाते-खाते…………….

गिद्धों के गिरोह में जबसे
हमने अपना नाम लिखाया।
लोग मरे दुर्भिक्षों में पर,
हमने सदा पेट भर खाया॥

कितने दिन नाक़ारा रहते;हम भी इज़्ज़तदार हो गये।
ठोकर खाते-खाते…………….

Tuesday, January 6, 2009

प्रिन्टर ने इन्कार कर दिया

कवि सम्मेलन की खातिर , ये सोचा कविता चार छाप लूँ
लेकिन प्रिन्टर ने कवितायें देने से इन्कार कर दिया

तकनीकी के साथ चले हम, इसीलिये की विदा डायरी
कम्पूटर पर संजो रखी है, हमने अपनी सकल शायरी
जहां कहीं भी जाते अपनी पेन-ड्राइव को ले जाते हैं
वहीं छाप कत अपनी कविता, सम्मेलन में जा गाते हैं

हम निर्भर हैं इन यंत्रों पर, ये हमने इज़हार कर दिया
इसीलिये प्रिन्टर ने कविता देने से इन्कार कर दिया

बोला, मेरी है कविता में जो तुम कहते एक कहानी
नहीं चाहता मैं दोबारा फिर से जाये कहीं बखानी
बहुत रो चुका काले आंसू, अब तक तुमसे इंगित लेकर
लेकिन आज कोष रीता है, कुछ न मिला वापिस, दे दे कर

जितने भी ट्रे में थे कागज़ एक एक को फाड़ रख दिया
और एक भी कविता मुझको देने से इन्कार कर दिया

बूट किया मैने तो उसने पॄष्ठ चार छह वापिस उगले
लेकिन उनमें अंकित थे कुछ धब्बे कुछ स्याही के गुठले
आटो और मैनुअल फ़ीडें, सब तकनीकें अजमा हारे
इसीलिये अब कविता के बिन आये हैं हम यहां बिचारे

जो प्लान था आज सुनाने का, वो बंटाढार कर दिया
क्योंकि मुझे प्रिन्टर ने कविता देने से इन्कार कर दिया

Saturday, January 3, 2009

उसने कभी भी

उसने कभी भी पीर पराई सुनी नहीं .
कितना भला किया कि बुराई सुनी नहीं.

रोटी के जमा-ख़र्च में ही उम्र कट गई,
हमने कभी ग़ज़ल या रुबाई सुनी नहीं .

औरों की तरह तुमने भी इलज़ाम ही दिये;
तुमने भी मेरी कोई सफाई सुनी नहीं.

बच्चों की नर्सरी के खिलौने तो सुन लिए;
ढाबे में बर्तनों की धुलाई सुनी नहीं.

मावस की घनी रात का हर झूठ रट लिया;
सूरज की तरह साफ सचाई सुनी नहीं.