Saturday, January 3, 2009

उसने कभी भी

उसने कभी भी पीर पराई सुनी नहीं .
कितना भला किया कि बुराई सुनी नहीं.

रोटी के जमा-ख़र्च में ही उम्र कट गई,
हमने कभी ग़ज़ल या रुबाई सुनी नहीं .

औरों की तरह तुमने भी इलज़ाम ही दिये;
तुमने भी मेरी कोई सफाई सुनी नहीं.

बच्चों की नर्सरी के खिलौने तो सुन लिए;
ढाबे में बर्तनों की धुलाई सुनी नहीं.

मावस की घनी रात का हर झूठ रट लिया;
सूरज की तरह साफ सचाई सुनी नहीं.

8 comments:

Mired Mirage said...

बढ़िया !
घुघूती बासूती

महेंद्र मिश्रा said...

गरीबी का एहसास कराती बहुत सटीक कविता .
आभार
महेंद्र मिश्रा जबलपुर.

makrand said...

मावस की घनी रात का हर झूठ रट लिया;
सूरज की तरह साफ सचाई सुनी नहीं.
bahut sunder rachana

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

यथार्थ और बहुत सुन्दर गजल!

Nirmla Kapila said...

auron ki tarah tum nebhi iljaam diye meri schaai suni nahi bahut achha likha hai bdhaai

राज भाटिय़ा said...

बच्चों की नर्सरी के खिलौने तो सुन लिए;
ढाबे में बर्तनों की धुलाई सुनी नहीं.
आप ने एक कडवा सच कह दिया, बहुत ही सुंदर.
धन्यवाद

"अर्श" said...

बहोत खूब लिखा है आपने ढेरो बधाई स्वीकार करें ....


अर्श

राकेश खंडेलवाल said...

आपने कहने के लिये कुछ छोड़ा नहीं