Tuesday, January 27, 2009

मेरे अधरों पर हस्ताक्षर

मेरे अधरों पर हस्ताक्षर

प्रिये अधर से तुमने अपने जब से किये अधर पर मेरे
हस्ताक्षर, तब से सपनों की बगिया और निखर आई है

आतुर हुई कामना भर ले यष्टि कमल को भुजपाशों में
आकाँक्षायें हैं सांसों की घुलें महक वाली सांसों में
नयनों की पुतली बन रांझा,चित्र हीर के बना रही है
नये रंग में नये रूप के मिले न जैसे इतिहासों में

देह तुम्हारी छूकर आई पुरबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है

लगी जागने भोर रूप की उजली धूप बाँह में लेकर
निशा संवरने लगी घटाओं से लहराते कुन्तल छूकर
नींदों वाली डोर थाम कर लगे झूलने झूला तारे
महकीं डगर, और अलगोजे लगे गूँजने चहुंदिशि भू पर

द्वार तुम्हारे से आ मलयज मेरी गलियों से जब गुजरी
मुझको लगा तुम्हारे नूतन संदेसे लेकर आई है

हुए तिरोहित एक निमिष में मन के मेरे संशय सारे
रातों में आ लगे जलाने दीपक पूनम के उजियारे
नदिया की लहरों सी पल पल लगीं उमड़ने मधुर उमंगें
एक तुम्हारी छवि रहती है बस नजरों में सांझ सकारे

स्वर से उपजी सरगम ने आ जब से छुआ गीत इक मेरा
लगा मुझे मेरे शब्दों में वीणा स्वयं उतर आई है

10 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

सुकुमार प्रणय का सुन्दर चित्र! बधाई।
कृपया सातवीं पँक्ति में टायपिंग की भूल सुधार लें।
'पुतबाई' की जगह 'पुरवाई' होगा शायद।

Udan Tashtari said...

देह तुम्हारी छूकर आई पुतबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है

पुरवाई कर के पढ़ लिया है जी. :)


बहुत सुन्दर गीत..डूब कर पढ़ा और आनन्द आ गया.

सतीश सक्सेना said...

वाह ! आनंद आ गया राकेश भाई ! एक बेहद खूबसूरत चित्रण के लिए बधाई !

Shardula said...

"हुए तिरोहित एक निमिष में मन के मेरे संशय सारे
रातों में आ लगे जलाने दीपक पूनम के उजियारे"
सुन्दर !

रंजना said...

हुए तिरोहित एक निमिष में मन के मेरे संशय सारे
रातों में आ लगे जलाने दीपक पूनम के उजियारे

वाह ! श्रृंगार रस की अविरल धारा प्रवाहित करती,अतिसुन्दर कोमल रचना.....

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर
धन्यवाद

SANJEEV MISHRA said...

नदिया की लहरों सी पल पल लगीं उमड़ने मधुर उमंगें
एक तुम्हारी छवि रहती है बस नजरों में सांझ सकारे

atyant sundar evam bhavpoorna rachna. lajawaab.

राकेश खंडेलवाल said...

मान्य अमरजी,

त्रुटि संशोधन कर दिया है. ध्यानाकर्षण के लिये हार्दिक धन्यवाद.

समीर भाई, सतीशजी, राजजी, रंजनाजी, संजीवजी तथा शार्दुलाजी-- आपके स्नेह से ही प्रेरणा प्राप्त होती है लेखनी को गतिशील होने के लिये.

सादर

राकेश

Jimmy said...

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