Friday, February 13, 2009

सारे छंद बिखर जाते हैं

नाम काव्य का लेकर जब जब
होते हैं भाषण, लफ़्फ़ाज़ी
अखबारी कतरन या कविता
में दिखता न फ़र्क जरा भी
और प्रशंसा के अफ़साने
जहाँ अपेक्षित बन जाते हैं
मित्र ! वहाँ कविता क्या होती ?
सारे छंद बिखर जाते हैं

इधर उधर की जोड़-तोड़ की
पैबंदों वाली रचनायें
क्या क्या पढ़ लें, क्या क्या सुन लें
किसको गायें, किसे सुनायें
आईने की बिखरी किरचों
में प्रतिबिम्ब छले जाते हैं
मित्र! नहीं कविता हो पाती
सारे छंद बिखर जाते हैं

अपने दर्पण में जब अपनी,
ही तस्वीर नजर आती है
और दृष्टि की सीम अपने
दरवाजे तक रह जाती है
शब्द-कोष में अर्थ क्षितिज के
अपने माफ़िक बन जाते हैं
तब न सही हो पाती कविता
सारे छंद बिखर जाते हैं

अपने अपने राग अलापें
सब अपनी अपनी ढपली पर
छोर छोर पर चित्रित होता
अपना हे फैला आडम्बर
और प्रशंसित और प्रशंसक
पूरक बन कर रह जाते हैं
वहाँ न कविता हो पाती है
सारे छंद बिखर जाते हैं

9 comments:

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन... हमेशा की तरह... वाह.. मान्यवर, वाह..

seema gupta said...

अपने दर्पण में जब अपनी,
ही तस्वीर नजर आती है
और दृष्टि की सीम अपने
दरवाजे तक रह जाती है
शब्द-कोष में अर्थ क्षितिज के
अपने माफ़िक बन जाते हैं
तब न सही हो पाती कविता
सारे छंद बिखर जाते हैं
" कविता न होने पाने की व्यथा को अच्छे और सार्थक शब्दों में ढाला गया है.....पढ़ कर कही कही मन कुछ व्यथित सा हो जाता है जैसे "आईने की बिखरी किरचों में प्रतिबिम्ब छले जाते हैं" अपने अपने राग अलापें
सब अपनी अपनी ढपली पर" ये पंक्तियाँ अपनी बेबसी और असहाय होने का दर्द व्यक्त करती हैं.....अपनी छाप छोड़ जाती हैं"

Regards

Udan Tashtari said...

और प्रशंसित और प्रशंसक
पूरक बन कर रह जाते हैं
वहाँ न कविता हो पाती है
सारे छंद बिखर जाते हैं

:) बेहतरीन!

रंजना said...

बहुत बहुत सही कहा आपने......आप उद्वेग में लिखते हैं तो वह गीत की निर्झरनी बनकर ही फूटती है.

Anonymous said...

बिलकुल Friday the 13th लायक कविता है जनाब!

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत सटीक और सार्थक। 'कविता' के नाम पर कुछ भी परोस देने की प्रवृत्ति भी एक फैशन बन गई है इन दिनों।

सतीश सक्सेना said...

बेहतरीन आलोचना आज के कवि और कविताओं की ! गीतों के भविष्य की सुरक्षा की बेहतर चिंता करने वाला , आप से अच्छा और कौन हस्ताक्षर हो सकता है ! शुभकामनायें भाई जी !

Anonymous said...

ऐसा तो हरदम होता है!
फनकार तू धैर्य क्यों खोता है?
कौआ ले अंगूर जाता जब,
क्या कोयल का मन रोता है ? :)

और शिलालेख शब्दों के
जब ज्ञानी जन लिख जाते हैं
भँवरों की तब भी मजबूरी
वो फूलों पे ही मंडराते हैं :)

Come on, move on ! you are greater than all this !! Do not waste your time thinking about it !! Give us poetry in its real form and beauty !!

Harkirat Haqeer said...

नाम काव्य का लेकर जब जब
होते हैं भाषण, लफ़्फ़ाज़ी
अखबारी कतरन या कविता
में दिखता न फ़र्क जरा भी
और प्रशंसा के अफ़साने
जहाँ अपेक्षित बन जाते हैं
मित्र ! वहाँ कविता क्या होती ?
सारे छंद बिखर जाते हैं.....

बहुत सटीक और सार्थक......!!