Friday, February 27, 2009

बस में बैठे

बस में बैठे बैठे आंखें भर आना।
याद आज तक है वो तेरा शहर जाना।

कभी समन्दर की तूफ़ानों की बातें;
और कभी हल्की बारिश से डर जाना॥

बाग़ कट चुके,खेतों में सड़कें दौड़ीं;
कैसा गाँव कहां छुट्टी में घर जाना॥

किसने लिख दी जीवन की ये परिभाषा!
ज़िन्दा रहने की कोशिश में मर जाना॥

कितना कठिन सफ़र होता है,पूछो मत,
शाम ढले बेरोज़गार का घर जाना।

8 comments:

Anonymous said...

कभी समन्दर की तूफ़ानों की बातें;
और कभी हल्की बारिश से डर जाना॥

bahut badhiya

Rachna Singh said...

किसने लिख दी जीवन की ये परिभाषा!
ज़िन्दा रहने की कोशिश में मर जाना॥

sunder shabd aur abhivyakti

Anonymous said...

"ज़िन्दा रहने की कोशिश में मर जाना" बहुत सुन्दर. आभार.

222222222222 said...

और मन ही मन मंदी को सोच-सोचकर भयभीत होते जाना।
सुंदर लाइनें।

sangita puri said...

बहुत सुंदर ..

राज भाटिय़ा said...

कितना कठिन सफ़र होता है,पूछो मत,
शाम ढले बेरोज़गार का घर जाना।
बहुत ही भावुक , लेकिन अति सुंदर रचना.
धन्यवाद

Shar said...

:)

Shardula said...

सारे शेर एक से बढ़ के एक !
ग़लत बात है !
अब बन्दा क्या करे . . . चलिए एक भी उद्धृत नहीं करते :)

बहुत नाज़ुक मिजाज़ ग़ज़ल है शायर साहिब ये ! ज़रा हौले से इसके ऊपर कोई दूसरी रचना पोस्ट कीजियेगा !

बेहतरीन! मन खुश कर दिया :)