Friday, March 20, 2009

गीत


पी के देखा हर नशा हर विष पिया,
किंतु फ़िर भी वेदना सोई नहीं।


घर से निकले थे बड़ी उम्मीद से

सब समस्याओं का हल मिल जायेगा.
इस मरुस्थल की नहीं सीमा तो क्या,
इस मरुस्थल में ही जल मिल जायेगा।


प्यास तन-मन की मगर ऐसी बढ़ी,
दिल दुखा तो आँख तक रोई नहीं।

वास्तविकताएँ चुभीं कुछ इस तरह
जग गए हम और सपने सो गए.
घिर गए कुछ यूं अपरिचित भीड़ में,
सारे परिचित,सारे अपने खो गए।

मुड़ के देखा भी कभी तो दूर तक,
वापसी का रास्ता कोई नहीं।

आज तक तो
जैसे-तैसे काट ली,
कल कहाँ जायेंगे कुछ भी तय नहीं.
दोपहर की रोटियाँ तो जुट गईं
शाम क्या खाएंगे कुछ भी तय नहीं।


जिंदगी के अनवरत संघर्ष में,
कौन सी निधि है कि जो खोई नहीं.

Tuesday, March 17, 2009

नाले याद आते हैं

बहाईं थीं जहां फ़ाकिर ने कागज़ की कभी कश्ती
कि जिसके साहिलों पर मजनुऒं की बस्तियां बसतीं
जहां हसरत तमन्ना के गले को घोंट देती थी
लगा कर लोट जिसमें भेंस दिन भर थी पड़ी हँसती
हरे वो रंग पानी के औ: काले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वो गन्दे नाले याद आते हैं

नहीं मालूम था हमको मुहब्बत जब करी हमने
कि माशूका की गलियों में लुटेंगे इस कदर सपने
जो उसके भाईयों ने एक दिन रख कर हमें कांधे
किया मज़बूर उसमें था सुअर के साथ मिल रहने
हमें माशूक के वो छह जियाले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वो गंदे नाले याद आते हैं

कहां है गंध वैसी, सड़ चुकी जो मछलियों वाली
जहां पर देख हीरों को बजी फ़रहाद की ताली
जहां तन्हाईयों में इश्क का बेला महकता था
जहां पर रक्स करती थी समूचे गांव की साली
अभी तक झुटपुटों के वे उजाले याद आते हैं
तुम्हारे गांव के वे ग्म्दे नाले याद आते हैं

किनारे टीन टप्पड़ का सिनेमाहाल इकलौता
जहां हीरो किया करता था हीरोइन से समझौता
जहां पर सीख पाये थे बजाना सीटियां हम सब
जहां उड़ता रहा था मालिकों के हाथ का तोता
हमें उनके निकलते वे दिवाले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वे गंदे नाले याद आते हैं

जहां पर एक दिन फ़रहाद ने शीरीं को छेड़ा था
निगाहे नाज की खातिर किया लम्बा बखेड़ा था
कहां पर चार कद्दावर जवानों ने उठा डंडा
मियां फ़रहाद की बखिया की तुरपन को उधेड़ा था
हमें फ़रहाद के अरमाँ निकाले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वे गंदे नाले याद आते हैं

Friday, March 6, 2009

कुछ यूं ही

छंद के बंद आते नहीं हैं मुझे, इसलिये एक कविता नहीं लिख सका
लोग कहते रहे गीत शिल्पी मुझे, शिल्प लेकिन नयाएक रच न सका
फिर भी संतोष है तार-झंकार से जो उमड़ती हुई है बही रागिनी
शब्द की एक नौका बहाते हुए,साथ कुछ दूर तक मैं उसे दे सका

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बोझ उसका है कांधे पे भारी बहुत, जो धरोहर हमें दी है वरदाई ने
और रसखान की वह अमानत जिसे, बांसुरी में पिरोया था कन्हाई ने
हमको खुसरो के पगचिन्ह का अनुसरण नित्य करना है इतना पता है हमें
और लिखने हैं फिर से वही गीत कुछ, जिनको सावन में गाया है पुरवाई ने

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लेखनी किन्तु अक्षम हुई है लगा शब्द से जोड़ पाती है नाता नहीं
मन पखेरु चला आज फिर उड़ कहीं, गीत कोई मगर गुनगुनाता नहीं
जो न संप्रेष्य होता स्वरों से कभी भाव, अभिव्यक्तियों के लिये प्रश्न है
भावनाओं का निर्झर उमड़ता तो है, धमनियों में मगर झनझनाता नहीं

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कांपते हैं अधर, थरथराती नजर, कंठ में कुछ अटकता हुआ सा लगे
और सीने की गहराईयों में कोई दर्द सहसा उमड़त हुआ सा लगे
चीन्ह पाने की असफ़ल हुईं कोशिशें, कोई रिश्ता नहीं अक्षरों से जुड़े
मात्रा की छुड़ा उंगलियां चल दिया,शब्द मेरा भटकता हुआ सा लगे