Tuesday, March 17, 2009

नाले याद आते हैं

बहाईं थीं जहां फ़ाकिर ने कागज़ की कभी कश्ती
कि जिसके साहिलों पर मजनुऒं की बस्तियां बसतीं
जहां हसरत तमन्ना के गले को घोंट देती थी
लगा कर लोट जिसमें भेंस दिन भर थी पड़ी हँसती
हरे वो रंग पानी के औ: काले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वो गन्दे नाले याद आते हैं

नहीं मालूम था हमको मुहब्बत जब करी हमने
कि माशूका की गलियों में लुटेंगे इस कदर सपने
जो उसके भाईयों ने एक दिन रख कर हमें कांधे
किया मज़बूर उसमें था सुअर के साथ मिल रहने
हमें माशूक के वो छह जियाले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वो गंदे नाले याद आते हैं

कहां है गंध वैसी, सड़ चुकी जो मछलियों वाली
जहां पर देख हीरों को बजी फ़रहाद की ताली
जहां तन्हाईयों में इश्क का बेला महकता था
जहां पर रक्स करती थी समूचे गांव की साली
अभी तक झुटपुटों के वे उजाले याद आते हैं
तुम्हारे गांव के वे ग्म्दे नाले याद आते हैं

किनारे टीन टप्पड़ का सिनेमाहाल इकलौता
जहां हीरो किया करता था हीरोइन से समझौता
जहां पर सीख पाये थे बजाना सीटियां हम सब
जहां उड़ता रहा था मालिकों के हाथ का तोता
हमें उनके निकलते वे दिवाले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वे गंदे नाले याद आते हैं

जहां पर एक दिन फ़रहाद ने शीरीं को छेड़ा था
निगाहे नाज की खातिर किया लम्बा बखेड़ा था
कहां पर चार कद्दावर जवानों ने उठा डंडा
मियां फ़रहाद की बखिया की तुरपन को उधेड़ा था
हमें फ़रहाद के अरमाँ निकाले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वे गंदे नाले याद आते हैं

7 comments:

Udan Tashtari said...

यह तो वही तरही मुशायरे वाली है न!! जबरदस्त रचा है राकेश जी ने!

Shar said...

Ha ha:)
Poora comment baad mein likhungi, abhi hans loon pahle:) :)

Anonymous said...

"लगा कर लोट जिसमें भेंस दिन भर थी पड़ी हँसती" --How do you know that buffalo was laughing:) ?? Tell us :)

नहीं मालूम था हमको मुहब्बत जब करी हमने
कि माशूका की गलियों में लुटेंगे इस कदर सपने
-- So ignorance is not a bliss always :) :)

जहां पर रक्स करती थी समूचे गांव की साली
--what you were doing there :)

किनारे टीन टप्पड़ का सिनेमाहाल इकलौता
--this line has got the most comic punch!!
जहां पर सीख पाये थे बजाना सीटियां हम सब
-- Now we know :)

निगाहे नाज की खातिर किया लम्बा बखेड़ा था
--At least did something !!
मियां फ़रहाद की बखिया की तुरपन को उधेड़ा था
-- A stitch in time . . .
हमें फ़रहाद के अरमाँ निकाले याद आते हैं
--Now the bumper question!! How do you know "Armaan" of somebody else??
So shall we read this poem again by putting a familiar face to "Farhaad" ?? :):)

Take care, friend:):)
A very cute poem indeed!!

Dr. Amar Jyoti said...

लगता है होली का ख़ुमार अभी उतरा नहीं।:)

anjana said...
This comment has been removed by the author.
anjana said...

पढ़ कर या यों कहें आपके लिखे को गा कर आनंद आ गया |आपको बहुत बहुत बधाई

कलम से .... said...

बधाई हमारी तरफ से भी ..बहुत सुंदर