Friday, March 20, 2009

गीत


पी के देखा हर नशा हर विष पिया,
किंतु फ़िर भी वेदना सोई नहीं।


घर से निकले थे बड़ी उम्मीद से

सब समस्याओं का हल मिल जायेगा.
इस मरुस्थल की नहीं सीमा तो क्या,
इस मरुस्थल में ही जल मिल जायेगा।


प्यास तन-मन की मगर ऐसी बढ़ी,
दिल दुखा तो आँख तक रोई नहीं।

वास्तविकताएँ चुभीं कुछ इस तरह
जग गए हम और सपने सो गए.
घिर गए कुछ यूं अपरिचित भीड़ में,
सारे परिचित,सारे अपने खो गए।

मुड़ के देखा भी कभी तो दूर तक,
वापसी का रास्ता कोई नहीं।

आज तक तो
जैसे-तैसे काट ली,
कल कहाँ जायेंगे कुछ भी तय नहीं.
दोपहर की रोटियाँ तो जुट गईं
शाम क्या खाएंगे कुछ भी तय नहीं।


जिंदगी के अनवरत संघर्ष में,
कौन सी निधि है कि जो खोई नहीं.

11 comments:

शारदा अरोरा said...

कुछ पल रुक कर सोचने को मजबूर कर देती है ये रचना

राज भाटिय़ा said...

घर से निकले थे बड़ी उम्मीद से
सब समस्याओं का हल मिल जायेगा.
इस मरुस्थल की नहीं सीमा तो क्या,
इस मरुस्थल में ही जल मिल जायेगा।
क्या बात है, बहुत ही सुंदर.
धन्यवाद

Shardula said...

बहुत सुन्दर! तो गीत भी लिखते हैं आप :)
========
"दिल दुखा तो आँख तक रोई नहीं।"
"जग गए हम और सपने सो गए"
--हृदयस्पर्शी !!
========
"दोपहर की रोटियाँ तो जुट गईं
शाम क्या खाएंगे कुछ भी तय नहीं।
-- ये आपकी हस्ताक्षर पंक्तियाँ, दमदार !
इन को पढ़ के मैं बिना नाम के पहचान लेती कि गीत आपका है !!
========
"जिंदगी के अनवरत संघर्ष में,
कौन सी निधि है कि जो खोई नहीं."
कौन सी निधि नहीं खोयी है ? . . . संवेदना !
लिखते रहिये. ऎसी रचनाओं की ज़रूरत है आज के इस दौर को !

Rachna Singh said...

जिंदगी के अनवरत संघर्ष में,
कौन सी निधि है कि जो खोई नहीं.
bahut khub

Pyaasa Sajal said...

दोपहर की रोटियाँ तो जुट गईं
शाम क्या खाएंगे कुछ भी तय नहीं।

ye sabse shaandar panktiyaan hai...bilkul,simple aur asardaar

Jayant Chaudhary said...

Waah ji waah.

Badi gahari baaten hain is chhoti kavitaa men.

~Jayant

Harkirat Haqeer said...

आज तक तो जैसे-तैसे काट ली,
कल कहाँ जायेंगे कुछ भी तय नहीं.
दोपहर की रोटियाँ तो जुट गईं
शाम क्या खाएंगे कुछ भी तय नहीं।

waah ji waah....!!

राकेश खंडेलवाल said...

जग गये हम और सपने सो गये.

निहायत खूबसूरती से कुछ शब्दों में सारा सार भर दिया आपने.

नमन

Anonymous said...

"जग गये हम और सपने सो गये"

Amar ji aur Rakesh Ji, dono so gaye hain kya janab :) ?
Maheena ho gaya kuchh post nahin kiya yahan :)

Ya phir yah ki somebody, everybody aur nobody wala kissa hai sir ji :) :)

Ab bhaav na khaeeye , likh bhee bhejiye kuchh :)

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

घर से निकले थे बड़ी उम्मीद से
सब समस्याओं का हल मिल जायेगा.
इस मरुस्थल की नहीं सीमा तो क्या,
इस मरुस्थल में ही जल मिल जायेगा।
बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना!
आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।धन्यवाद..

Niharika said...

beautifull composition..