Friday, April 17, 2009

मेरे भोले सिसकते मन

मेरे भोले सिसकते मन! मेरे कातर करुण क्रंदन!
रोओ ; चुप भी हो जाओ;
चलो चुपचाप सो जाओ।
बढ़ीं इतनी निराशाएं , कि जीवन भार लगता है;
बहुत उलझा हुआ इस विश्व का व्यापार लगता है।
जनाज़ों के शहर में ज़िंदगी को कौन पूछेगा?
मुखौटों के नगर में आदमी को कौन पूछेगा??
यही है रास्ता बेहतर, कि सर तक ओढ़ कर चादर,
मधुर सपनों में खो जाओ।
चलो चुपचाप सो जाओ।
ये माना जानलेवा ये जिगर का दर्द है अपना;
ये क्या कम है ज़माने में कोई हमदर्द है अपना।
अगर रोना पड़ा ही तो -अकेले तो न रोयेंगे;
सफ़र में खो गये भी तो, अकेले तो न खोयेंगे।
किसी का हाथ होगा ही, कोई तो साथ होगा ही,
चलो फ़िर क्या है खो जाओ;
चलो, चुपचाप सो जाओ।
बहुत चाहा कि इस रूठे ज़माने को मना लूं मैं;
बिगड़ती बात जैसे हो सके वैसे बना लूँ मैं।
मगर मतलब की दुनिया प्यार का व्यवहार क्या समझे!
मेरे अरमान क्या हैं - अजनबी संसार क्या समझे!!
बहुत बेफिक्र रहता हूँ; सभी से अब तो कहता हूँ-
ख़फा होते हो; हो जाओ ।
चलो चुपचाप सो जाओ।

Tuesday, April 14, 2009

मैं इक और गीत रच डालूँ

बुझे बुझे सरगम के सुर हैं
थके थके सारे नूपुर हैं
शब्दों का पिट गको आतुर है
भावों की लुट हई पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैं
और तकाजा एक तुम्हारा मैं इक नया गीत लिख डालूँ

अक्षर अक्षर बिखर गई हैं
गाथाय्रं कुब याद नहीं हैं
शीरीं तो हैं बहुत एक भी
लेकिन पर फ़रहाद नहीं है
बाजीराव नहीं मिल पाया
थकी ढूँढते है मस्तानी
इतिहासों की प्रेम कथायें
किसने समझी किसने जानी
राजमुकुट के प्रत्याशी तो खडे हुए हैं पंक्ति बनाकर
तुम्ही बताओ सिंहासन पर मैं इनमें से किसे बिठा लूँ

महके हुए फूल उपवन से
रह रह कर आवाज़ लगाते
मल्हारों के रथ पनघट पर
रूक जायेंगे आते जाते
फागुन के बासन्ती रंग में
छुपी हुईं पतझडी हवायें
बार बार अपनी ही धुन में
एक पुरानी कथा सुनायें

माना है अनजान डगरिया, लेकिन दिशाचिन्ह अनगिनती
असमंजस में पडा हुआ हूँ, किसको छोडूँ किसे उठा लूँ

अलगोजे तो नहीं छेड़ता
गूँज रहा कोई बाऊल स्वर
रह जाता घुल कर सितार में
सरगम के स्रोतों का निर्झर
लग जाते हैं अब शब्दों पर
पहरे नये, व्याकरण वाले
छन्द संवरता तो होठों पर
लेकिन रहता है डर डर कर

गज़ल नज़्म मुक्तक रुबाईयां, सब ही मुझसे संबोद्जित हैं
तुम बोलो इनमें से किसको अभिव्यक्ति का सिला बना लूँ

और तुम्हारा एक तकाजा, मैं इक और गीत रच डालूँ
मैं इक और गीत रच डालूँ