Tuesday, April 14, 2009

मैं इक और गीत रच डालूँ

बुझे बुझे सरगम के सुर हैं
थके थके सारे नूपुर हैं
शब्दों का पिट गको आतुर है
भावों की लुट हई पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैं
और तकाजा एक तुम्हारा मैं इक नया गीत लिख डालूँ

अक्षर अक्षर बिखर गई हैं
गाथाय्रं कुब याद नहीं हैं
शीरीं तो हैं बहुत एक भी
लेकिन पर फ़रहाद नहीं है
बाजीराव नहीं मिल पाया
थकी ढूँढते है मस्तानी
इतिहासों की प्रेम कथायें
किसने समझी किसने जानी
राजमुकुट के प्रत्याशी तो खडे हुए हैं पंक्ति बनाकर
तुम्ही बताओ सिंहासन पर मैं इनमें से किसे बिठा लूँ

महके हुए फूल उपवन से
रह रह कर आवाज़ लगाते
मल्हारों के रथ पनघट पर
रूक जायेंगे आते जाते
फागुन के बासन्ती रंग में
छुपी हुईं पतझडी हवायें
बार बार अपनी ही धुन में
एक पुरानी कथा सुनायें

माना है अनजान डगरिया, लेकिन दिशाचिन्ह अनगिनती
असमंजस में पडा हुआ हूँ, किसको छोडूँ किसे उठा लूँ

अलगोजे तो नहीं छेड़ता
गूँज रहा कोई बाऊल स्वर
रह जाता घुल कर सितार में
सरगम के स्रोतों का निर्झर
लग जाते हैं अब शब्दों पर
पहरे नये, व्याकरण वाले
छन्द संवरता तो होठों पर
लेकिन रहता है डर डर कर

गज़ल नज़्म मुक्तक रुबाईयां, सब ही मुझसे संबोद्जित हैं
तुम बोलो इनमें से किसको अभिव्यक्ति का सिला बना लूँ

और तुम्हारा एक तकाजा, मैं इक और गीत रच डालूँ
मैं इक और गीत रच डालूँ

8 comments:

mehek said...

ess.comमहके हुए फूल उपवन से
रह रह कर आवाज़ लगाते
मल्हारों के रथ पनघट पर
रूक जायेंगे आते जाते
फागुन के बासन्ती रंग में
छुपी हुईं पतझडी हवायें
बार बार अपनी ही धुन में
एक पुरानी कथा सुनायें
waah behad khubsurat

Anonymous said...

Hey Ishwar !! Itna diwaala pit gaya ki ek geet, ek saath-saath , do-do sheershak se preshit kar rahein hain geetsamraat :)

Aalas tajiye, geet rachiye :)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मैं इक और गीत रच डालूँ.....

किसी ने मना थोड़े ना किया है।

Shardula said...

"अक्षर अक्षर बिखर गई हैं
गाथाएं कुछ याद नहीं हैं
शीरीं तो हैं बहुत एक भी
लेकिन पर फ़रहाद नहीं है
बाजीराव नहीं मिल पाया
थकी ढूँढते है मस्तानी
इतिहासों की प्रेम कथायें
किसने समझी किसने जानी
राजमुकुट के प्रत्याशी तो खड़े हुए हैं पंक्ति बनाकर
तुम्ही बताओ सिंहासन पर मैं इनमें से किसे बिठा लूँ"
बहुत ही सुन्दर! आपकी कवितायें इतिहास की प्रेम कथाओं का refresher course सी लगती हैं गुरुदेव!

Anonymous said...

रह जाता घुल कर सितार में
सरगम के स्रोतों का निर्झर
:(
लग जाते हैं अब शब्दों पर
पहरे नये, व्याकरण वाले
:(
छन्द संवरता तो होठों पर
लेकिन रहता है डर डर कर
:(

Dr. Amar Jyoti said...

क्यों? आख़िर ऐसा क्या हुआ?:)

Shardula said...

"भावों की लुट गयी पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैं"
--वाह !

"मल्हारों के रथ पनघट पर
रूक जायेंगे आते जाते
फागुन के बासन्ती रंग में
छुपी हुईं पतझडी हवायें"
--सुन्दर !

सतीश सक्सेना said...

बहुत दिन बाद आपको पढ़ पाया ! मज़ा आ गया भाई जी , बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति !