Friday, April 17, 2009

मेरे भोले सिसकते मन

मेरे भोले सिसकते मन! मेरे कातर करुण क्रंदन!
रोओ ; चुप भी हो जाओ;
चलो चुपचाप सो जाओ।
बढ़ीं इतनी निराशाएं , कि जीवन भार लगता है;
बहुत उलझा हुआ इस विश्व का व्यापार लगता है।
जनाज़ों के शहर में ज़िंदगी को कौन पूछेगा?
मुखौटों के नगर में आदमी को कौन पूछेगा??
यही है रास्ता बेहतर, कि सर तक ओढ़ कर चादर,
मधुर सपनों में खो जाओ।
चलो चुपचाप सो जाओ।
ये माना जानलेवा ये जिगर का दर्द है अपना;
ये क्या कम है ज़माने में कोई हमदर्द है अपना।
अगर रोना पड़ा ही तो -अकेले तो न रोयेंगे;
सफ़र में खो गये भी तो, अकेले तो न खोयेंगे।
किसी का हाथ होगा ही, कोई तो साथ होगा ही,
चलो फ़िर क्या है खो जाओ;
चलो, चुपचाप सो जाओ।
बहुत चाहा कि इस रूठे ज़माने को मना लूं मैं;
बिगड़ती बात जैसे हो सके वैसे बना लूँ मैं।
मगर मतलब की दुनिया प्यार का व्यवहार क्या समझे!
मेरे अरमान क्या हैं - अजनबी संसार क्या समझे!!
बहुत बेफिक्र रहता हूँ; सभी से अब तो कहता हूँ-
ख़फा होते हो; हो जाओ ।
चलो चुपचाप सो जाओ।

10 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा रचना!!

Dr. Amar Jyoti said...

क्यों? आख़िर ऐसा क्या हुआ?:)

श्यामल सुमन said...

भावपूर्ण खूबसूरत रचना। भाई वाह। बधाई।

अगर चुपचाप सो जाऊँ नहीं बदलेगी ये दुनियाँ।
हमारे मौन की आवाज को पहचानता है कौन?

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

रंजना said...

Bhaavpoorn panktiyan...Peeda ko bade hi prabhaavshalee dhang se abhivyakti di hai aapne..Badhai.

Shardula said...

बहुत सुन्दर गीत , प्रवाह भी उल्लेखनीय !
भाव पक्ष भी बहुत ही मज़बूत . सारे छंद प्यारे.
अब आपसे और भी गीत सुनने को मिलेंगे ऎसी आशा करते हैं:)
बड़ी प्यारी सी देवानंद के style की बफ़िक्री है गीत में, साथ में राजकपूर जैसी भावुकता भी. किसी पुराने फिल्मी hit गीत से कम नहीं है :) बंबई की राह ना ले लीजियेगा जनाब ! हम एक बेहद ईमानदार और इंकलाबी शायर से मरहूम हो जायेंगे फिर :)

महामंत्री - तस्लीम said...

मन से बातें करना आदमी का प्रिय शगल होता है। लेकिन उसे कविता के रूप में पहली बार पढा, मजा आ गया।

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TSALIIM.
-SBAI-

श्याम सखा 'श्याम' said...

गीत निराशा में ले जाता है,पर गीतकार शायद यही चाहता था,उसमें तो सफ़ल है गीतकार,उससे आगे की कई रचनाएं भी निराशायुक्त हैं ।जिन्दगी बहुआयामी है,माना आप आजकाल किसी खास भाव में हैं,पर कुछ पुरानी ही सही आशा वादी रचनाएं भी पोस्ट करें
शब्दों का पिट गको आतुर है-पिट गको नही समझ सका
श्याम सखा

Babli said...

मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा ! आपने बहुत ही सुंदर लिखा है ! मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है !

सतीश सक्सेना said...

इतनी सजीव निराशा, गज़ब की रचना के लिए शुभकामनायें भाई जी !

Suman said...

good