Friday, July 24, 2009

जी हम भी कविता करते हैं

मान्य महोदय हमें बुलायें सम्मेलन में हम भी कवि हैं
हर महफ़िल में जकर कविता खुले कंठ गाया करते हैं
हमने हर छुटकुला उठा कर अक्सर उसकी टाँगें तोड़ीं
और सभ्य भाषा की जितनी थीं सीमायें, सारी छोड़ी
पहले तो द्विअर्थी शब्दों से हम काम चला लेते थे
बातें साफ़ किन्तु अब कहते , शर्म हया की पूँछ मरोड़ी
हमने सरगम सीखी है वैशाखनन्दनों के गायन से
बड़े गर्व से बात सभी को हम यह बतलाया करते हैं
अभियंता हम, इसीलिये शब्दों से अटकलपच्ची करते
हम वकवास छाप कर अपनी कविता कह कर एंठा करते
देह यष्टि के गिरि श्रंगों को हमने विषय वस्तु माना है
केवल उनकी चर्चा अपनी तथाकथित कविता में करते
एक बार दें माईक हमको, फिर देखें हम हटें न पीछे
शब्द हमारे होठों से पतझर के पत्तों से झरते हैं
महाकवि हम, हम दिन में दस खंड-काव्य भी लिख सकते हैं
जो करते हैं वाह, वही तो अपने मित्र हुआ करते हैं
जो न बजा पाता है ताली, वो मूरख है अज्ञानी है
उसे काव्य की समझ नहीं ये साफ़ साफ़ हम कह सकते हैं
सारे आयोजक माने हैं हम सचमुच ही लौह-कवि हैं
इसीलिये आमंत्रित हमको करने में अक्सर डरते हैं
जो सम्मेलन बिना हमारे होता, उसमें जान न होती
हमको सुनकर सब हँसते हैं, बाकी को सुन जनता रोती
हुए हमारे जो अनुगामी, वे मंचों पर पूजे जाते
हम वसूलते संयोजक से, न आने की सदा फ़िरौती
नीरज, सोम, कुँअर, भारत हों, हसुं चाहे गुलज़ार, व्यास या
ये सब एक हमारी कविता के आगे पानी भरते हैं
हम दरबारी हैं तिकड़म से सारा काम कराते अपना
मौके पड़ते ही हर इक के आगे शीश झुकाते अपना
कुत्तों से सीखा है हमने पीछे फ़िरना पूँछ हिलाते
और गधे को भी हम अक्सर बाप बना लेते हैं अपना
भाषा की बैसाखी लेकर चलते हैं हम सीना ताने
जिस थाली में खाते हैं हम, छेद उसी में ही करते हैं
जी हम भी कविता करते हैं

8 comments:

विवेक सिंह said...

पता नहीं कौन कौन लपेटे में आयेगा इस आँधी के,

एकाध लाइन में तो लगा जैसे हम भी फ़ँस रहे हैं,

फ़िर दूसरे ही पल हम बरी हो गए दूसरा फ़ँस गया,

हम वसूलते संयोजक से, न आने की सदा फ़िरौती

यह लाइन तो मेरा दिल ले गयी !

Udan Tashtari said...

अजी, आप कविता ही नहीं करते बल्कि बहुत बेहतरीन कविता करते हैं..बधाई !!!!

Unknown said...

HA HA HA HA HA HA HA HA
rakeshji,
nihaal kar diya ........
aaj toh subah subah hi aapne pataakhe fod diye
ha ha ha ha

hriday se abhinandan !

sangita puri said...

बहुत बढिया .. कविता करते रहें .. शुभकामनाएं !!

Shar said...

:) :)

Satish Saxena said...

इस गीत का मैं हमेशा प्रसंशक रहा हूँ , और आपकी सामान्य नीति और शैली से अलग हट कर है ! एक सिद्ध हस्त कलम द्वारा लिखी गयी एक अमूल्य हास्य रचना ! आशा है आप इस विषय पर और भी बेवाक रचनाएँ देंगे

Dr. Amar Jyoti said...

:) :) :)

Anonymous said...

अभियंता हम, इसीलिये शब्दों से अटकलपच्ची करते
:)))