Thursday, August 13, 2009

सबको मालूम थे

सबको मालूम थे हमसे भी भुलाए न गए
वे कथानक जो कभी तुमको सुनाये न गए 

गीत लिखते रहे जीवन में अंधेरों के खिलाफ़
और दो-चार दिये तुमसे जलाए न गए
 
दूर से ही सुनीं वेदों की ऋचाएं अक्सर
यज्ञ में तो कभी शम्बूक बुलाए न गए 

यूकेलिप्टस के दरख्तों में न छाया न नमी
बरगद-ओ-नीम कभी तुमसे लगाए न गए

इसी बस्ती में सुदामा भी किशन भी हैं नदीम
ये अलग बात है मिलने कभी आये न गए

7 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

मन को झिंझोड़ती
कुशल भावाभिव्‍यक्ति

परमजीत बाली said...

अमर जी,बहुत बेहतरीन रचना है बधाई स्वीकारें।

गीत लिखते रहे जीवन में अंधेरों के खिलाफ़
और दो-चार दिये तुमसे जलाए न गए

सतीश सक्सेना said...

"दूर से ही सुनीं वेदों की ऋचाएं अक्सर
यज्ञ में तो कभी शम्बूक बुलाए न गए"

बहुत खूब भाई जी . शायद ही किसी ने शम्बूक ऋषि को याद किया होगा ...

hem pandey said...

'गीत लिखते रहे जीवन में अंधेरों के खिलाफ़
और दो-चार दिये तुमसे जलाए न गए'
- आप गीत लिखते रहिये. प्रेरणा पा कर एक नहीं अनेक लोग दिए जलाने आगे आयेंगे.

शरद कोकास said...

यह बस्ती तो गोया आज की बस्ती हो गई ।

सतीश सक्सेना said...

आपकी बेहतरीन रचनाओं में से एक, यह एक बेशकीमती मोती है !

Voice Of The People said...

यूकेलिप्टस के दरख्तों में न छाया न नमी
बरगद-ओ-नीम कभी तुमसे लगाए न गए
डॉ अमर ज्योति जी अच्छी तरह से पेश किया है.