Tuesday, October 20, 2009

माना मद्धम है

माना  मद्धम  है, थरथराती  है
फिर भी इक लौ तो जगमगाती है

 मैं अकेला कभी नहीं गाता
वो मेरे साथ गुनगुनाती है

हां ये सच है के कुछ दरख़्त कटे
एक बुलबुल तो फिर भी गाती है

मैं अकेला कहां मेरे मन में 
एक तस्वीर मुस्कराती है

आँख कितनी ही मूंद ले कोई
ज़िन्दगी आइना दिखाती है

16 comments:

Anonymous said...

india190आँख कितनी ही मूंद ले कोई
ज़िन्दगी आइना दिखाती है
wonderful

Satish Saxena said...

अधिकतर हम अंधों को जिन्दगी के रंग नहीं दिखते, हम अपने कष्टों में जीते हुए दूसरों को भी हंसने का मौका नहीं देना चाहते ...

बेहतरीन सन्देश दिया है आपने जीवन को समझने के लिए डॉ अमर ! बहुत कुछ सिखाएगी यह ग़ज़ल, बस श्रद्धा होनी चाहिए !

हार्दिक शुभकामनायें !

Shardula said...

"हां ये सच है के कुछ दरख़्त कटे
एक बुलबुल तो फिर भी गाती है "
ये शेर मेरा हुआ अमर जी !
जब भी मुझे ज़िंदगी में केवल एक शेर सुनने की गुंजाईश हो तब ऐसा ही, पंछी, दरख्तों वाला कोई haunting सा शेर सुनना चाहूंगी !
=======
कितनी खूबसूरत है ये पूरी ग़ज़ल! पढ़ के कृतार्थ हुई ! मन में जो लेखक है उसे मख्ता सबसे अच्छा लगा. "आँख कितनी ही मूंद ले कोई, ज़िन्दगी आइना दिखाती है"
---------
पढ़ते ही दूसरा शेर भी दिल ले गया "मैं अकेला कभी नहीं गाता, वो मेरे साथ गुनगुनाती है". मज़ा आ गया दादा, बहुत खूब लिखते हैं आप. यूँ ही नहीं हो गए हैं हमारे पसंदीदा शायर आप :)
सादर ...

राज भाटिय़ा said...

मैं अकेला कहां मेरे मन में
एक तस्वीर मुस्कराती है
बहुत सुंदर.
धन्यवाद

देवेन्द्र पाण्डेय said...

आँच कितनी ही मूंद ले कोई
जिदंगी आइना दिखाती है

वाह! क्या खूब....

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

खण्डेलवाल जी, शादी की साल गिरह की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Pushpendra Singh "Pushp" said...

बहुत खूब अच्छी रचना
बधाई स्वीकारें

dweepanter said...

बहुत सुन्दर रचना......
pls visit.......
www.dweepanter.blogspot.com

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

Pushpendra Singh "Pushp" said...

इस बेहतरीन रचना के लिए
बहुत बहुत आभार
एवं नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं

तिलक राज कपूर said...

न जाने क्‍यूँ ये ग़ज़ल रह रह कर दुष्‍यन्‍त कुमार की ग़ज़ल की याद दिला रही है:
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है
इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है।
बड़ी कद्दावर ग़ज़ल कही है आपने।
बधाई

Pushpendra Singh "Pushp" said...

बहुत सुन्दर रचना
बहुत बहुत आभार

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

Bahut khub...

Ab subscribe kar liya hai aata rahunga.

-Sulabh

निर्मला कपिला said...

मैं अकेला कहां मेरे मन में
एक तस्वीर मुस्कराती है

आँख कितनी ही मूंद ले कोई
ज़िन्दगी आइना दिखाती है
हां ये सच है के कुछ दरख़्त कटे
एक बुलबुल तो फिर भी गाती है "
येतीनो शेर तो दिल को छू गये लाजवाब गज़ल है । शायद आपका ब्लाग पहली बार देखा है यहाँ तो खजाना भरा पडा है फुरसत मे देखती हूँ शुभकामनायें

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

नए कलाम का इंतज़ार है.

surender said...

aik bahut hi sundar geetika hai
hr shair dil ko chune ki koshish mein laga rahta hai.

Surender Bhutani
warsaw (Poland)