Tuesday, March 23, 2010

रास्ता ही

रास्ता ही

रास्ता ही भूल जाओ एक दिन

आओ मेरे घर भी आओ एक दिन

 

बासी रोटी से ज़रा आगे बढ़ो

उसको टॉफ़ी भी खिलाओ एक दिन

 

क्या मिलेगा ऐसे गुमसुम बैठ कर,

साथ मेरे गुनगुनाओ एक दिन

 

बर्फ़ सम्बन्धों की पिघलेगी ज़रूर

धूप जैसे मुस्कराओ एक दिन

 

घर के सन्नाटे में गुम हो जाओगे

दौड़ती सड़कों पे आओ एक दिन

                          

Tuesday, March 9, 2010

शब्द हैं अजनबी

शब्द हैं अजनबी


शब्द आते नहीं होंठ पर अब मेरे,

भावना सो गई शाल इक ओढ़ कर

कंठ में स्वर अटकते हुए रह गये,

आये बाहर नहीं मौन को तोड़ कर

कुछ कहा न गया, कुछ लिखा न गया,

वाणी चुप हो रही, शब्द हो अजनबी

और वह इक कलम जिसको अपना कहा,

वो भी चल दी मेरे हाथ को छोड़ कर