Tuesday, March 9, 2010

शब्द हैं अजनबी

शब्द हैं अजनबी


शब्द आते नहीं होंठ पर अब मेरे,

भावना सो गई शाल इक ओढ़ कर

कंठ में स्वर अटकते हुए रह गये,

आये बाहर नहीं मौन को तोड़ कर

कुछ कहा न गया, कुछ लिखा न गया,

वाणी चुप हो रही, शब्द हो अजनबी

और वह इक कलम जिसको अपना कहा,

वो भी चल दी मेरे हाथ को छोड़ कर

6 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना. धन्यवाद

सतीश सक्सेना said...

वाह ! राकेश भाई !
काफी दिन बाद आपकी यह रचना पढ़ कर सोचता रह गया , आप तो प्रवर्तक है आपकी मायूसी से गीतों का और छंदों का बेहद नुक्सान होगा ! आशा है आप सानंद होंगे !
आपका सादर

Dr. Amar Jyoti said...

अवसाद के पलों का मर्मस्पर्शी चित्र।
बधाई।

Shardula said...

जानते हैं सबसे पहले क्या लगा इस छोटे से गीत को पढ़ कर ... वाकई कोई मुश्किल तो है, वरना आप और इतना छोटा गीत!! ... ये मार खाने वाली बात की है मैंने :)
फिर लगा ... ये आपकी कलम कहाँ चल दी ... ज़रा हुलिया बता दें तो मैं ढूंढ के ... अपने पास रख लूं :) ... ये मार खाने वाली बात # २ :)
***
बहुत दिनों में इस ब्लॉग पे आयी हूँ, खुश हूँ कि कुछ मिला पढ़ने को...चाहे छोटा सा ही सही...प्रसाद तो थोड़ा भी बहुत है !
आशा है जल्दी ही अवसाद का अवसान होगा और कविता के फूल खिलेंगे !
नमन!

स्वाति said...

शब्द आते नहीं होंठ पर अब मेरे,

भावना सो गई शाल इक ओढ़ कर

सुंदर रचना.

अरुणेश मिश्र said...

प्रशंसनीय ।